Showing posts with label बस यूँ ही. Show all posts
Showing posts with label बस यूँ ही. Show all posts

Tuesday, December 31, 2024

New Year's New Resolution

हर जाते हुए पुराने साल के अंत में 
लोगों को नए साल को ग्रैंड welcom करने का 
सबसे बेहतरीन तरीका लगता है... 
नए साल का नया 
Resolution यानि संकल्प बनाना. 

पर जिस हड़बड़ी और गड़बड़ी में नए साल 
के आगमन के चन्द घंटे या एक दो दिन 
पहले Resolution यानि संकल्प की खोज
की जाती है. वैसे ही नए साल से आने के 
चंद दिनों या हफ़्तों में ये 
Resolution यानि संकल्प जिन्दगी की 
आपाधापी में खो भी जाते हैं.

इसलिए इस नववर्ष के लिए कोई नया 
Resolution यानि संकल्प की खोज 
करने के बदले बस ये संकल्प लें, 
जो Resolution यानि संकल्प 
हमने पिछले साल लिया था
उसे ही इस नववर्ष में अमल में 
लाने की कोशिश करूँगा.

जय हो ! 

Sunday, July 12, 2020

मोदी जी के निजीकरण पर बेहतरीन गीत...

मोदी जी के निजीकरण के शानदार निर्णय और काम पर गाया गया बेहतरीन गीत. 
छोटा सा गीत है ... आप भी सुनिए, शायद समझ में आये.



Tuesday, June 30, 2020

मुफ्तखोर भारत

मोदीजी का देश के नाम लॉक डाउन के घोषणा से लेकर अब तक का छठा संबोधन, अभी-अभी मोदीजी के वेबसाइट पर सुना. सुनकर ये तो पता चल गया कि सरकार अब ये सांत्वना नहीं दे रही कि कोरोना इस महीने चला जाएगा या अगले महीने चला जाएगा. मतलब सरकार अब ये समझ चुकी है, देश की हालत आने वाले दिनों में और भी बदतर होने वाला है.

पर इसके लिए जिस तरह से सरकार लोगों को मुफ्तखोरी की रबड़ी बाँट रही है, ये अर्थव्यवस्था को बिलकुल ही पंगु बना देगा और लोगों को कामचोर. हमारा ग्रामीण क्षेत्र पहले से ही मजदूरों और कामगारों की कमी झेल रहा. ग्रामीण मजदुर या तो पलायन कर रहे हैं या फिर मुफ्त की रोटी मचान पर बैठकर तोड़ रहे हैं. इस तरह से लोग और निकम्मे और आलसी बनेंगे. जब लोगों का पेट बैठ-बिठाए ही भरता रहेगा, तो फिर कोई क्यों काम करे. 

वाह मोदीजी डॉक्टर, मेडिकल स्टाफ, सेना, रेलवे, सफाई कर्मी जो इस कोरोना काल में जान हथेली पर लेकर काम कर रहे हैं, उन्हें तो आप उपहार में सैलरी पर कैंची चला रहे हो और यहाँ 90 करोड़ लोगों को मुफ्त की रबड़ी बाँट रहे हो, जो दो रूपये किलो की राशन खाकर पहले ही निकम्मे और कामचोर हो चुके हैं. आत्मनिर्भर भारत बने ना बने, निकम्मा भारत तो जरुर बनेगा.
जय हो... जय हो. 


देश की हालत क्या होगी, यही सोचकर दशकों पहले लिखी मेरी ये कविता आज सहसा ही याद हो आई. ये 2002 में उस समय के दिग्गज हिंदी पत्रिका में ऑनलाइन छपी थी. 


नई दिशा

पहले अच्छी तरह से
हडडी–पसली तोड़ दो.
खड़ा न हो सके
ऐसा निचोड़ दो.
टूटकर पंगु हो जाए
तब देश को नया मोड़ दो.

-अंशुमान चक्रपाणि 
(http://hindinest.com/kavita/2003/034.htm)

इसे भी देखे :