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Thursday, June 18, 2020

चलो Tik Tok... Tik Tok करें

लद्दाख के अभियंता और जाने-माने शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk).

चीन के साथ 44 दिनों से बढ़ते तनाव के बीच, लद्दाख में सोमवार को हुए खुनी संघर्ष में 20 भारतीय जवानों ने अपनी बलिदान दे दी. सेना के जवान दुर्गम क्षेत्र में जान की परवाह न कर भी डटी रहती है, ताकि हम सुरक्षित रह सकें. ताकि हम चायनीज TikTok पर वीडियों बना सकें, चाइनीज मोबाइल खरीद के साथ सस्ते सामान खरीदकर चीन की झोली भर सकें. उसी पैसे का इस्तेमाल दुष्ट चायनीज सरकार अपनी दुष्ट विस्तारवादी नीति के लिए कर सके. अपनी विस्तारवादी नीति के कारण ही आजादी के बाद से वो हमारी हजारों किलोमीटर जमीन हथिया चूका है, अब जब उसे कड़ा जवाब मिल रहा है. उसके डर से हमारे जवान पीछे नहीं हट रहे तो हमारे जवानों को धोखे से क़त्ल करने के लिए भिड़ा, ये अलग बात है कि हमारे जवानों ने एक के बदले दो को लुढका दिया और जैसे को तैसा जवाब दिया.  पर आप जारी रखों अपना TikTok. हाँ, अपना नया फोन भी चायनीज लेने की जो प्लानिंग कर रखी है. 
ले लो... हाँ... हाँ ले लो. अरे, सेना के जवान ही मरे हैं, हम थोड़े मरे रहे हैं. जो सेना और देश के बारे में सोचें. 


लद्दाख के अभियंता और जाने-माने शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) ने अपने यू ट्यूब चैनल पर चाइना के सामानों के बहिष्कार की अपील की थी. जिसका परिणाम ये हुआ कि चीन ने घबराकर गूगल प्ले स्टोर से चायना की एप्प्स को खोजकर बताने वाले भारतीय एप्प को हटवा दिया. पर इन सबसे आपको और हमको क्या लेना है. हम थोड़े ना सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) को जानते हैं. हमें क्या करना उनके बहिष्कार की अपील की. आप लगे रहो अपने TikTok वीडियों पर. सोनम वांगचुक को कोई कामधंधा नहीं है, जो देश के बारे में सोचते रहते हैं. आप बढ़िया वीडियों बना रहे हो, लगे रहो. 
देश रहे या जाए, हमें क्या करना. 
अपना TikTok वीडियों और चायना का फोन जिंदाबाद. 


अब कई बहुत ज्यादा दिमाग वाले लोग ये भी कहेंगे कि सरकार तो कुछ कर नहीं रही हमारे बहिष्कार करने से क्या होगा. तो आपको बता दूँ सरकार क्या करेगी और क्या नहीं वो सरकार का मामला है और विदेश नीति के साथ व्यापार नीति का मामला है. पर हमें चीनी सामान के बहिष्कार करने में कोई नीति रोक नहीं सकती. वैसे बीएसएनएल के बाद रेलवे ने भी चीन की कंपनी के साथ 471 करोड़ का करार रद्द करने का फैसला ले लिया है है. रेलवे ने कहा है की काम की रफ्तार धीमी होने के कारण कॉन्ट्रैक्ट को रद्द कर रहे हैं. पर इससे हमें क्या करना है. हम तो Tik Tok बनाने में मस्त और व्यस्त हैं. वैसे कम अक्ल होने का यही तो प्रमाण हैं.

किसने कहा जो चीनी आइटम ले रखा है उसे तोड़ दो, फोड़ दो. अरे शुरुआत तो कर सकते हैं. चीनी सामानों को ना तो कह सकते हैं. आज एप्प को फोन से हटाने से शुरू करेंगे तो धीरे-धीरे फोन और अन्य उपकरण खरीदने के पहले ये देखने की आदत भी पड़ जायेगी कि वो चाइनीज ना हो. ऐसा भी नहीं है कि हम इन तीन फुटियें के सामान के बिना जीवन ही नहीं जी सकते. पर नहीं हमें क्या करना है. सबकुछ ऐसी ही चलता रहता है, अपनी ख़रीददारी जारी रखिये. सेना के जवान ही मरे हैं, हमें क्या करना.

हमारी खुफिया एजेंसियों ने 50 चाइनीज ऐप्स की लिस्ट जारी की है. जिन्हें देश और आपके सूचनाओं के लिए भी खतरनाक बताया गया है. इसमें सबसे पहले नंबर पर वही TikTok है, जिसमें मटक-मटक के आप वीडियों बना अपने मानसिक दिवालियेपन को दुनिया के सामने, खुद ही रख रहे हो. पर इससे भी हमें क्या करना है, चलिए हम फिर से मटक-मटक के एक नया वीडियों बनाते हैं. अरे उसी TikTok पर, जिसकी आपको लत पड़ चुकी है. दिमाग के अन्दर सिर्फ और सिर्फ घासफूस ना भरी हो, तो आप भी अपना मोबाईल चेक कर इस लिस्ट से मिला लो. उसके बाद क्या करना है वो आप खुद दो मिनट आँखें बंद कर सोचों, सोचो उस निहत्थे शहीदों के बारे में जिन्हें तीन फुतिये लोगों ने छल से मार डाला. जवाब खुद ब खुद मिल जायगा. अंत में बस एक प्रसिद्द शेर से अपनी बात ख़त्म करता हूँ-
कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों.

खुफिया एजेंसियों ने इन 50 खतरनाक चाइनीज ऐप्स की लिस्ट जारी की :

टिक-टॉक (TikTok)
हेलो (Helo)
यूसी ब्राउजर (UC Browser)
यूसी न्यूज (UC News)
शेयर इट (Sharit)
लाइकी (Likee)
360 सिक्योरिटी (360 Security)
न्यूज डॉग (NewsDog)
शिन (SHEIN)
विगो वीडियो (Vigo Video)
वी चैट (WeChat)
वीबो (Weibo)
जूम (ZOOM)
वीबो लाइव (Vibo live)
क्लब फैक्टरी (Club Factory)
शेंडर  (Xender)
ब्यूटी प्लस (BeautyPlus)
क्वाई (Kwai)
रोमवी (ROMWE)
फोटो वंडर (Photo Wonder)
एपीयूएस ब्राउजर (APUS Browser)
वीवा वीडियो (VivaVideo)
क्यूयू वीडियो इंक (QU Video Inc)
परफेक्ट कोर्प (Perfect Corp)
सीएम ब्राउजर (CM Browser)
वायरस क्लीनर (Virus Cleaner)
हाई सिक्योरिटी लैब (Hi Security Lab)
एमआई कम्यूनिटी (Mi Community)
डीयू रिकाॅर्डर (DU recorder)
यूकैम मेकअप (YouCam Makeup)
एमआई स्टोर (Mi Store)
डीयू बैटरी सेवर (DU Battery Saver)
डीयू ब्राउजर (DU Browser)
डीयू क्लीनर (DU Cleaner)
डीयू प्राइवेसी (DU Privacy)
क्लीन मास्टर (Clean Master)
बैदू ट्रांसलेट (Baidu Translate)
बैदू मैप वंडर कैमरा (Baidu Map Wonder Camera)
ईएस फाइल एक्पलोरर (ES File Explorer)
क्यूक्यू इंटरनेशनल (QQ International)
क्यूक्यू लाॅन्चर (QQ Launcher)
क्यूक्यू सिक्योरिटी सेंटर (QQ Security Centre)
क्यूक्यू प्लेयर (QQ Player)
क्यूक्यू म्यूजिक-क्यूक्यू मेल (QQ Music QQ Mail)
क्यूक्यू न्यूज फीड (QQ NewsFeed)
वी सिंक (WeSync)
सेल्फी सिटी (SelfieCity)
क्लैश ऑफ किंग्स मेल मास्टर (Clash of Kings Mail Master)
एमआई वीडियो काॅल-शाओमी (Mi Video call-Xiaomi)
पैरेलल स्पेस (Parallel Space)

Monday, May 11, 2020

कोरोना और कामचोर-निकम्मे सरकारी कर्मचारी


क्या सेना को घर बैठने की इजाजत दी गई है?
क्या मेडिकल स्टाफ के साथ डॉक्टर घर में बैठे हैं ?
क्या सिर्फ पैसेजर ट्रेन बंद होने से ऑपरेशन और मेंटेनेंस में लगे रेलवे कर्मी घर में बैठ गए हैं?
क्या पैरा मिलट्री फ़ोर्स और पुलिस वाले घरों में बंद हैं ?
क्या हमारे घरों में निर्बाध बिजली पानी पहुँचाने वाले और सफाईकर्मी घर में सो रहे हैं?
नहीं, घर में सो रहे हैं वो, जो अपने को देश कर कर्णधार मानते थे. घर में सो रहे कॉर्पोरेट के लोग, घर में सो रहे हैं प्राइवेट ट्रांसपोर्ट वाले. घर में सो रहे प्राइवेट हॉस्पिटल वाले, प्राइवेट डॉक्टर जो हजारों में फ़ीस वसूलते थे. घर में सो रहे वो लोग, जो दिन रात इन सरकारी कर्मचारियों को कोसते और गलियां देते थे और बस दो महीने पहले ही ये चाहते थे कि सबकुछ प्राइवेट के हाथों में बेच दिया जाएँ.
और काम कर रहे सिर्फ और सिर्फ वही कामचोर और निकम्मे सरकारी कर्मचारी. काश, सरकार कोरोना के आने के पहले रेलवे के कॉर्पोरेट के हाथों बेच देती और साथ ही साथ सरकारी हॉस्पिटल भी बंद करवा देती. तो आज देखा का नक्शा, सबकुछ बेचने को आतुर सरकार भी ना पहचान पाती.
#घरमेंरहियेसुरक्षितरहिये

Sunday, May 10, 2020

माई बाप कई दिनों से खाना नसीब ना हुआ...

दो दिन पहले दिल्ली के एक महिला मित्र से बात हुई. पता चला गाजियाबाद एक्स में उनके फ्लैट के पीछे लोगों ने झुग्गी लगा रखा है और वो दिनभर बैठकर उस झुग्गी में हो रहे तमासे को देखकर अपने लॉक डाउन का आनन्द ले रही हैं.

मुझे आश्चर्य हुआ. ऐसा क्या हो रहा है उस झुग्गी में, जो आप पूरी लॉक डाउन में झुग्गी से आनन्द प्राप्त कर रहीं हैं? फिर उसने जो कहानी सुनाई उसे सुनकर तो मुझे समझ ही नहीं आ रहा था उसके साथ मैं पेट पकड़ कर हंसू या ऐसे लोगों का व्यवस्था का मजाक उड़ाने के लिए रोऊँ.  

जैसे उसने बताया...
सुबह 9 बजे कुछ लोग गाड़ियों में खाना भर भर कर आते हैं, इन गरीबों को खिलापिला कर एक घंटे में गाड़ी खाली कर जाते हैं.

11 बजे फिर से सरदार जी लोग आ जाते हैं और प्रेम से एक-एक को नाक - मुंह तक ठूस-ठूस कर खिलाते हैं.

1 बजे फिर सरकारी लाव-लश्कर आता है, ये लोग फिर से भूखे-नंगे की तरह खाते हैं.

3 बजे फिर से कोई NGO खाना लेकर आ जाता है. वही सारे बेचारे जो सुबह से भूखे हैं, फिर से खाते हैं.

इसके बाद भी कई लोग सुखा राशन-पानी देकर जाते हैं. ये लोग उसे भी लेकर गरीब होने का धर्म निभाते हैं.

शाम को फिर से लोग आते हैं खाना लेकर और रात का खाना खिला जाते हैं. ये बेचारे गरीब लोग, कल से खाना नहीं खाया ऐसा बोलकर फिर से दो - तीन लोगों का खाना अकेले खा जाते हैं.

रात होने के पहले जब कुछ मीडिया वाले पहुँचते हैं, तो यही जो लोग दस दिनों का खाना एक दिन में गटक चुके हैं. मीडिया के सामने ऐसा रोना रोते हैं, ऐसा रोना रोते हैं. जिसे टीवी पर घरों में बैठकर देखने वाले भी रो पड़ते हैं. कोई कह रहा है - "माई बाप कई दिनों से खाना नसीब ना हुआ", "कोई आरोप लगा रहा है यहाँ तो आजतक कोई आया ही नहीं"

जहाँ एक ओर लोग भूखे मरने को मजबूर हो रहे हैं, वही कुछ ऐसे भी नज़ारे सामने आ रहे हैं. हो ये रहा है, जो क्षेत्र पहुँच में हैं, नजदीक है वहाँ लोग पहुँच जाते हैं और ऐसे गरीब लोग जिनका पेट शायद FCI के गोदामों में जमा सारे अनाज को खाकर भी ना बुझे, वो इसका नाजायज फायदा उठा रहे हैं या यूँ कहे की पीड़ित होने का ड्रामा कर कई और भूखे लोगों के पेट पर लात मारकर सारा खाना और राशन हजम कर ले रहे हैं.

Saturday, May 9, 2020

अंडा बिरयानी और वेज बिरयानी


सफ़र से नाता काफी नजदीकी रहा है. मेघालय और आसाम यात्रा पर था तो ट्रेन में सफ़र के दौरान एक बात पर ध्यान गया. बात बिल्कुल सामान्य है, सबने देखा-सुना होगा. ट्रैनों में खाने में अंडा बिरयानी और वेज बिरयानी ही हमें सबसे ज्यादा बिकते दिखते हैं. जब देखो तो अंडा बिरयानी और वेज बिरयानी की आवाज आती रहती है.
अंडा बिरयानी..... अंडा बिरयानी.....
वेज बिरयानी..... वेज बिरयानी.....


ऐसा प्रतीत होता है मतलब अंडा बिरयानी को रेलवे ने एक धरोहर की तरह संरक्षित किया हुआ है. मुझे तो ऐसा लगता है रेलवे को इसका पेटेंट ले लेना चाहिए. रेलवे की खानपान (पैंट्री सेवा) को नॉवेल पुरूस्कार प्रदान किया जाना चाहिए. आपको अगर इस विलुप्त व्यंजन को खाना हो तो दुनिया में कहीं अंडा बिरयानी न मिले तो निकल पड़िए किसी भारतीय रेल के सफर पर और मजे लेते रहिए अंडा बिरयानी और वेज बिरयानी का. भले हो सकता है वो एक दिन पहले की बची चावल की बनी हो, पर अंडा बिरयानी और वेज बिरयानी को पसंद करने वालों को इस बारे में ज्यादा सोचने की जरूरत ही नहीं स्वाद लेते रहिए बिल्कुल विलुप्तप्राय रेसिपी अंडा बिरयानी और वेज बिरयानी का.

वैसे मुझे लगता है इस रेसिपी को पसंद करने वालों और खरीदकर पूरे का  पूरा चट कर जाने वालों को भी वीर चक्र या शौर्य चक्र तो मिलना ही चाहिए. मतलब जिगर होना चाहिए यार, इसे पूरी तरह खाने के लिए. लेकिन बात ये भी है कि आपकी जेब से पैसे चले गए, बेकार सा अंडा बिरयानी और वेज बिरयानी आपके सामने आपको मुहं चिढाने लगे तो कोई भी महारथी जो करेगा वो यही होगा कि उसकी जान ले ली जाएँ. और अंडा बिरयानी और वेज बिरयानी की जान तो प्लेट को पूरी तरह साफ कर चट कर जाने के बाद ही जाएगी. 

हाँ, अगर आपकी किस्मत बिल्कुल गणेशजी ने खुद अपने ही हाथों से लिखी हो और आपको बिल्कुल मस्त आइटम हाथ लग गया, मतलब बिल्कुल फ्रेश अंडा बिरयानी और वेज बिरयानी मिल गया हो तो, इसे स्वर्ग भोग ही समझिए. और इससे कम की कोई गुंजाईश ही नहीं.
क्या कहते हो आप ?

बात ठीक लगे तो शेयर भी कर लीजिए, ताकि बाकी लोग जो अभी तक अंडा बिरयानी और वेज बिरयानी का स्वाद से अनजान हो, वो भी इसका भोग लगा सके और अपने जीवन को धन्य कर सकें.

Tuesday, February 18, 2020

आपकी रामप्यारी चाय.... चाय...


आओ आज आपको एक गूढ़ ज्ञान दूँ...


सारे चाय पीने वाले कृप्या ज्ञानवाणी पर ध्यान दें, जे आपके लिए ही है. और हाँ मैं यहाँ आपको चाय छोड़ने नहीं बोलने वाला, आप निश्चित रहे. 😂
पिछली बार आपको बताया था ट्रेन के बिरयानी और अंडा बिरयानी का राज और आज बारी है आपकी रामप्यारी
चाय.... चाय...
(बिरियानी का फंडा का लिंक
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10156733265908231&id=565053230)
आपकी प्यारी इसलिए बोला, मुझे इससे उतनी ही नफरत है जितनी शराब... बोले तो दारू से. 😝
नफरत इसलिए, क्योंकि है तो यह किसी काम का नहीं, उल्टा हजार बीमारियों की दुकान बना जाती आपके शरीर को.
खैर, मुझे इससे क्या.
आप पियो... आप मरो...
डॉक्टर को पैसे देते रहो... गैस.... एसिडिटी... हाइपरटेंशन... कब्ज... अल्सर... पाइल्स को बढ़ाते रहो....
चाय... चाय.... 😂
खैर मुद्दा जे भी ना है. 😜
असली बात जो आपको बताने वाला हूँ, वो है.... ट्रेन में आप जो चाय पीते हैं, बनती कैसे है? देखा है क्या किसी ने बनती हुई अपनी रामप्यारी को?
नहीं देखा तो चलो मैं दिखाता हूँ....
चाय वाले serving pot को नल 🚰 के नीचे लगाकर उसे भर लिया जाता है, थोड़ा खाली रखा जाता है ताकि दूध के लिए थोड़ी गुंजाईश रहे. अब इसे उठाकर सीधा लगा दिया जाता है गर्म होने. पता है गर्म कैसे करेंगे... अरे वो घरों में पानी गर्म करने के लिए रॉड आता है न बस उसे घुसेडे देते है और स्विच ऑन कर दिया हो गया. पानी गर्म होने पर उसमें चाय पत्ती को एक पोटली में बाँधकर डुबो देते हैं. हाँ जे कपड़ा हो सकता है उसके पहले साफ सफाई में इस्तेमाल हुआ हो 😜😂 थोड़ी देर के बाद दुध को पैकेट से सीधे गर्म होते serving pot में डाल दिया जाता है. अब जे मत समझ लेना कि 10 लीटर में 5 लीटर दुध दिया जा रहा. 😜 इसके साथ ही चीनी डाला दिया जाता है और किसी, यहाँ वहाँ पड़े डंडे से उसे मिला दिया जाता है और बन गया आपकी रामप्यारी चाय. यही serving pot लेकर दिन रात चाय वाला आपकी कान खाए रहता है हर डब्बे में. और आप पीते भी बड़े चाव और शान से हो 10 और 20 रुपये देकर. पियो पियो... मजे करो.
सुबह का बना चाय सुबह को खत्म न हुआ तो उसे फिर से एक बार गर्म कर दिया और फिर शुरू हो गया चाय.... चाय... 😝
अब चाय वाले की किस्मत खराब हो या मेरे जैसे मिल जाएं या फिर कुछ लोग घर से हॉट बोतल में लेकर भी चलते हैं और चाय न बिकी तो फिर वही चाय आप शाम और रात को सोते सोते भी यह कहते पीते हो कि मुझे तो सोने के पहले चाय न मिले तो नींद नहीं आती. बढ़िया है जी पियो... चाय.... चाय...
आपलोगों के लिए ही ठेकेदार आईआरसीटीसी को करोड़ों दे रहा पेंट्रीकार के ठेके का, आखिर उसके बीबी बच्चे कहाँ जाएंगे. आप न खाओगे बिरयानी और अंडा बिरयानी और न पियोगे चाय, तो उस बेचारे के बीबी बच्चे तो भूखे मर जायेंगे. समाजवाद अपनाओ... अपने को मारकर भी दूसरे के घर में चूल्हा जलाओ. 😂 😜
और हाँ, अगली बार से कोशिश करना कम से कम पाँच - सात कप चाय तो निपटा ही देना और नहीं तो क्या. 😂 और हाँ रेलवे के पेटेंट बिरियानी और अंडा बिरयानी भी जम के खाओ, भले घर से लाया आपका खाना बासी हो गया हो और फेंकने लायक हो. पर पेंट्रीकार का एक दिन पहले के चावल से बना अंडा 🥚 बिरियानी कभी बासी नहीं होता. आप आराम और शान से खाओ. 😂
आज के लिए इतना ज्ञान ही काफी है, नहीं तो दस्त हो जायेगा. 😂
हाँ, बात समझ आ जाए तो शेयर करते जाना, ताकि और तक बात पहुंचे.

Saturday, January 11, 2020

गूग्लू की खोट भरी चाल ....

गूग्लू की खोट भरी रिपोर्ट
आजकल लोग गूग्लू के इस रिपोर्ट को खूब चेप रहे अपने वाल पर, जो बताती है की आप कितने देश, कितने शहर घुमे और वहाँ कितने जगहों को देखा. अब ये बात अलग है कि जहाँ आप और हम रुके भी नहीं उसे भी दिखा दे रहा जे गूग्लू. मतलब यह बिलकुल सही रिपोर्ट नहीं दे रहा. मैं इतने दावे से यह कैसे कह रहा, आओ समझाता हूँ.
मेरी रिपोर्ट में गूग्लू जो शहर दिखा रहा आप भी ध्यान से देखो, जे कटनी, जबलपुर, पिपरिया, इटारसी और जलगांव दिखा रहा, मतलब यहाँ मैंने यात्रा की. पर सच्चाई जे है मुंबई जाते वक्त ट्रेन रुकने पर बस चंद मिनट के लिए रेलवे स्टेशन पर उतरा था. मतलब किसी की हवाई जहाज पसेंजर ट्रेन की तरह कई शहरों में रूकती आ रही तो, जे गूग्लू उसे भी हमें उल्लू बनाने के लिए यात्रा रिपोर्ट में दिखायेगा.
मेरे कहने का मतलब जे हैं कि अपने किसी मित्र की ऐसी पोस्ट में 10 - 20- 30 देशों की यात्रा देखकर अपनी बेसिक ह्यूमन इंस्टिंट "जलन" को जाया मत करने लगना. जे गूग्लू की खोट भरी चाल है, फंसना मत.
इसमें देखने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात जे है की जे आपकी सेहत का रिपोर्ट कार्ड भी दे रहा है, जिसे कोई पूछ न रहा. जे बता रहा आप कितने घंटे साइकिल से चलें, कितने घंटे और कितने किलोमीटर पैदल चले. मेरी तो इस गूग्लू ने कचरा कर दी. क्योंकि वाक पर ज्यादातर मैं मोबइल लेकर होता न था, तो जे आंकड़ा भी रिपोर्ट में कम ही दिखा रहा. पर आलसियों अपनी रिपोर्ट में पैदल चले की रिपोर्ट भी देखो और जाग जाओ. यही है असली काम ही चीज, बाकी सब मोह माया है.
ऐसे गूढ़ ज्ञान और कोई न देगा और बेकार में दोस्तों की गूग्लू की खोट भरी रिपोर्ट देखकर अपनी बेसिक ह्यूमन इंस्टिंट "जलन" को जाया करते. आपको जे पोस्ट समझ आ जाये तो शेयर भी कर लिया करो, हर बात बोलना पड़ेगा क्या.

Saturday, November 23, 2019

पर्सनल के पप्पा...



आज सुबह के साढ़े चार बजे होंगे, लल्ला - लल्ला लोरी स्टाइल में विक्रमशिला एक्सप्रेस ट्रेन हिलाती - झुलाती जा रही थी और मैं एक नन्हें बच्चे की तरह सिमटा - लिपटा चादर ओढ़े निद्रादेवी के आगोश में प़डा था. तभी शोर ने मुझे निद्रादेवी के आगोश से कूदकर बाहर आने को विवश कर दिया. अनमने ढंग से आंखें खोली, एक पैसेंजर के साथ बहस चल रही है, पेंट्री कार के वेंडर या मैनेजर जो भी रहें हों. बाहर देखा मुगलसराय स्टेशन पर गाड़ी खड़ी थी. 

देखिए माजरा क्या है -
पैंट्री कार वाला - आप कौन हैं? पैंट्री कार में कैसे घुस गए?

पैसेंजर - मैं पर्सनल का बाबु हूँ, धनबाद का.

पैंट्री कार वाला - पर्सनल का बाबु?

पैसेंजर - हाँ

पैंट्री कार वाला- इहे गाड़ी में के टीटी हैं का?

पैसेंजर - क्या मतलब?

पैंट्री कार वाला- आप टीटी के पप्पा हैं न, हम समझ गए. कौन सा टीटी के पप्पा हैं?

पैसेंजर - अरे नहीं पर्सनल का बाबु हूँ.

पैंट्री कार वाला- हाँ... हाँ... आप टीटी बाबु के पप्पा हैं. ऊ टीटी बाबु कोई आएगा तो बात करियेगा. हम नहीं जानते कौनो पर्सनल टीटी बाबु को.

पैसेंजर - अरे बड़े अजीब आदमी हो यार तुम तो. मैं DRM ऑफिस, धनबाद का क्लर्क हूँ.

पैंट्री कार वाला- चुपचाप आप ऐसी में जाइए, चार बजे सुबह पैंट्री में घुस रहे हैं. एतना देर से पर्सनल का बाबु.... पर्सनल का बाबु का बोल रहे हैं. हम सोच रहे हैं आप पर्सनल के पप्पा हैं.

पैसेंजर - रेलवे का काम करते हो पर्सनल का बाबु क्या होता है नहीं पता?

पैंट्री कार वाला - हमको कौनो जरूरतें नहीं है कुछ पता करने का. आप चुपचाप उतर कर ऐसी या स्लीपर में जाइए.
उसके बाद पर्सनल के पप्पा को पैंट्री वाले ने धक्के देकर बाहर कर दिया, क्योंकि वो सीधी तरह से उतरने को तैयार ही न था. नीचे धक्का  खाते हुए देख लेने की बात कह गया.

पूरे दिन हम पाँच जने पर्सनल के पप्पा बोलकर ठहाका मारते रहे.

Wednesday, November 20, 2019

I'm jack-of-all-trades, master of none

पिछले कुछ दिनों में, मेरे मित्रों ने मुझे कुछ सलाह दी. मित्रों की सलाह देखिये - पहला मित्र योग से जुड़ा है - "ये आजकल क्या करते रहते हो, कभी नैनीताल, कभी भीमताल, कभी मेघालय, कभी सिक्किम. भाई योग की बात करो, हम सिर्फ योग को फॉलो करते हैं.... गुरु जी की बात करो." मैं हाथ जोड़कर - अब ऐसा ही करूँगा गुरुभाई. दूसरा मित्र मेरे पर्सनल फाइनेंस के जानकारी की वजह से जुड़ा था मुझसे - "अबे ये क्या करता रहता है, फाइनेंस तो नजर ही नहीं आ रहा है तुम्हारी पोस्ट में. कुछ insurance ही बिकवा दो, तेरा भी फायदा होगा." मैं हाथ जोड़कर - ठीक है अब से insurance ही बेचूंगा. तीसरा मित्र काफी पुरानी जान पहचान है- "ये क्या करते रहते हो? कभी योग, कभी ट्रेवल, कभी कविता, कभी पर्सनल फाइनेंस, कभी राइटिंग, कभी फोटोग्राफी, तो कभी बागवानी, कभी नेचर तो कभी कुकिंग. यार इतना समय और जानकारी कहाँ से लाता है. मुझे समझ ही नहीं आता तू क्या है." मैं - फिर क्या करूँ ? "यार एक ही फील्ड पर टिके रहो, ये रेलवे के ट्रेन की तरह ट्रेक मत बदलते रहो." मैं हाथ जोड़कर - ठीक है मैं बस अपनी नौकरी के अलावा कुछ नहीं सोचूंगा अब आगे से. चौथा मित्र, जो मेरे कई सारे ट्रेवल देखकर जलाभुना जा रहा है- "क्या है ये www.yayavarektraveler.com? उसकी बात करो जिससे कुछ समाज का भला हो. जब देखो घुमने-फिरने की बात करते रहते हो. पैसे खर्च होते हैं घुमने में भाई, वो कौन देगा?" मैं हाथ जोड़कर - भाई ऐसा है तुम मरो अपने पैसे के साथ, मुझे जो अच्छा लगता है करता हूँ. वैसे एक बात बताओ, ये मेरे घुमने, मेरे वेबसाइट और मेरे घर को चलाने को तुम डोनेसन देते हो क्या मुझे? चौथा मित्र तिलमिला उठा- "यार, तेरी ऐसी पोस्ट देखकर पेट में बहुत भारी गैस बन जाती है मुझे, कलेजा जलने लगता है." ये सब एक सप्ताह में घटित घटनाक्रम पर आधारित है. मैं अपने जवाब में अंग्रेजी की एक phrases कहना चाहता हूँ - “I'm jack-of-all-trades, master of none” मुझे अपनी जिन्दगी जीनी है, अपने सपनों के साथ मरना नहीं जीना चाहता हूँ, तो जो अच्छा लगता है करता हूँ. और मेरे भाई नीली छतरी वाले ने ही मुझे Multi Skilled बनाया तो इसमें मेरा क्या दोष.

Friday, November 8, 2019

कहाँ स्मार्ट सिटी भागलपुर ....और कहाँ दिल्ली.... जैसे राजा भोज और गंगू तेली

दिल्ली में बड़ी हाय तौबा मची है प्रदुषण को लेकर, लोगबाग के साथ कोर्ट भी कोस रही सरकार को. पर.... पर...
आइये सिल्क सिटी के नाम से जाना जाने वाले बिहार के दुसरे बड़े शहर, भागलपुर, वैसे तो अधिकारिक रूप से अभी भी गया ही दूसरा बड़ा शहर है. पर वो अब काफी पुरानी बात हो चुकी है और भागलपुर आगे हो चला है, पर सरकार तो अब जनगणना में ही इसे घोषित करेगी. जो मोदी जी की असीम कृपा से अब स्मार्ट सिटी भागलपुर हो गया.

अब आप कहेंगे क्या खास है भाई यहाँ, क्यों बुला रहे हो ?
तो जवाब है, बस एक बार भागलपुर आ जाओ और शहर को देखो, सड़कों पर घूमों और फिर आपको पता चलेगा यार ऐसे भी नरक होते हैं इस धरती पर. इसके सामने दिल्ली का प्रदुषण तो अभी बाल्यकाल में ही है. यहाँ सड़कों की धुल से आपके आगे जाने वाला ऑटो ही इतनी नहला देगा की सफ़ेद रुमाल काला हो जायेगा और बीबी घर में पूछेगी ... अजी मैंने तो सफ़ेद रुमाल दिया था.... जे कहाँ से ले आये??

सड़क पर कूड़े की तो पूरी पुराण लिखी जा सकती है. लोग निकलते हैं घरों से और दे मारते हैं बाउंसर और सडक पर जब तक कम से कम पचास मीटर तक कूड़ा न फैले क्या खाक कूड़ा फेंका. फिर बड़ी शान से चारो ओर देख जैसे ललकार रहें हों .... है कोई माई का लाल जो मेरे से भी आगे कूड़ा फेंक के दिखाए???? नगर निगम के भाड़े के सफाई कर्मी घरों से कूड़ा जमा कर सड़कों पर फैला जाते हैं. और मुख्य सड़कों पर भी नाले का पानी गंगा जल की तरह बहता रहता है सालों भर, लोग इसमें आचमन कर अपने को धन्य मानते होते हैं, विश्वास हो तो हो आइये स्टेशन के पास ही स्थित सब्जी मंडी और लोहा पट्टी. हाँ, इसमें भागलपुर की शान जैन मंदिर एरिया को भी शामिल कर लीजिये. जैन तीर्थ यात्री तो अब आने से भी कतराने लगे वहाँ बने नाले के तालाब से जो सालों से वैसा ही पड़ा है. 

सड़कों पर धुल और मिटटी की कोई कमी नहीं, यहाँ लक्मे की कोई जरूरत न होती महिलाओं को. स्मार्ट सिटी जो ठहरा.... बाहर निकलों और सडक पर आते ही हो गया मेकअप. बिलकूल फेयर एंड लवली जैसा... चकाचक.
सड़कों पर जाम की तो ऐसी हालत है की दिल्ली के लोगों को अपने मोहल्ले के गटर में कूदकर ही जान दे देनी चाहिए. यहाँ जाम नहीं... महाजाम होता हो ..... नहीं समझे ?.... बुद्धू हो यार आपलोग.... महाजाम मतलब कम से कम 100 किलोमीटर और थोडा बढ़ ले तो 250 से 300 किलोमीटर का महाजाम तो यहाँ आम बात है. मतलब आज लगे तो दो दिन बाद भी न हटे, इसे कहते हैं जाम. दिल्ली में घंटा जाम होता है.... एक घंटे में जाम ख़त्म. धत्त ...... और मंदबुद्दी लोग उसे जाम कहते हैं. 

अब आप कहोगे लोग रहते कैसे हैं???.... 
क्या रहते हैं भाई.... निरीह लोग डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड के साथ स्वांस सम्बन्धी रोगों से ग्रषित होते रहे हैं. मतलब कोई चारा न है, दिल्ली में वैज्ञानिक बोले हैं दस साल उम्र कम हो रही है... हिंया तो उस हिसाब से बीस साल कम हो रहे हैं लोगों के. पर नगर निगम सो रहा है, मेयर और उप मेयर सो रहे हैं, सांसद और विधायक सो रहे हैं, पुलिस और प्रसाशन सो रहे हैं, सरकार सो रही और जनता को तो मरना है तो मर रही है मायागंज में डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड और  न जाने किस - किस बीमारी से. अस्पताल तो जैसे मरने वाले के लिए काशी और मरीजों के साथ जाने वाले परिचितों के लिए पिकनिक स्थल बना हुआ है. बिलकुल मेले सा माहौल बना है, हर दुसरे घर में अभी डेंगू और मलेरिया से लोग पड़े हैं और डॉक्टर की चाँदी ही चाँदी. हर हफ्ते डेंगू से सिर्फ भागलपुर में ही दो - चार निकल ले रहे स्वर्ग की यात्रा पर, पर हमरे विकास पुरुष नितीश बाबु मिडिया में ताल ठोके हैं की बिहार में डेंगू से एक भी मौत न हुई. और तो और जे विकास पुरुष खुद  साल में कम से कम बारह दौरे कर ही लेते हैं भागलपुर के, हैं आखिर बिहार का दूसरा बड़ा शहर अब. वोट पड़े हैं, उनके कुछ लंगोटिया यार भी पड़े हैं इस नरक में.
इतना सब है क्या दिल्ली में????? नहीं न????

तो फिर प्रदूषित शहर का तगमा बिहार के भागलपुर को दो, दिल्ली को फर्जी में विजेता बनाए हैं पत्रकार और मीलॉर्ड मिलकर. 
स्मार्ट सिटी भागलपुर और यहाँ के नगर निगम की जय हो !

#bhagalpursmartcity

Tuesday, July 30, 2019

घुमक्कडी क्यों जरूरी है





घुमक्कडी क्यों ???


घुमक्कडी अपनी कुंठा शांत करने के लिए नहीं होती,
घुमक्कडी होती है जीने के लिए और मुर्दे इसका स्वाद नहीं जान सकते.
घूमना मतलब खुद को जानना-पहचानना, घूमना मतलब देश के संस्कृति को, अपनी धरोहर को जानना. जब आप बाहर निकलते हैं तो हर एक दिन संघर्ष होता है हर दिन वो आपको जिंदिगी में जीने और परेशानियों से लड़ने कि शक्ति देती हैं. मेरा तो मत हैं- 
“Travel, initially, to lose myself; and travel, next to find myself.”
मुझ से जब कोई पूछता है-
भाई बहुत घूमते हो, अभी कुछ दिनों पहले ही तो घूम कर लौटे न ?
क्या करने जाते हो यार ?
मेरा जवाब होता है -
"पिछली बार प्यास जगाने गया था और अब बुझाने जा रहा हूँ"
😍😛😍
और हाँ, घूमने के लिए ढेर सारे पैसे चाहिए, ऐसा नहीं हैं ?
पर्यटक और घुमक्कडी/ यायावर अलग-अलग होते हैं और घुमक्कड/ यायावर का अपना ही तरीका होता है. पर्यटक से अलग.
मैं खुद छोटी सी नौकरी कर रहा हूँ, किराये के मकान में रहता हूँ.
तो क्या जीना छोड दूँ?
कबाड़ी की तरह सिर्फ कमाने, खाने और बच्चे पैदा करना, पैसे बैंक में छोडकर मर जाना मेरी फितरत नहीं.
यायावरी परमो धर्मः
अंशुमान चक्रपाणि

Tuesday, December 11, 2018

चिलचिलाती ठण्ड और रेलवे की कुल्फी

लगभग एक घंटे की यात्रा परिवार और बच्चों के साथ स्लीपर कोच में कर रहा हूँ. भारतीय रेलवे के स्लीपर कोच की सबसे बड़ी समस्या जाड़े में और बरसात में जो मुझे लगती है वो है ट्रेन की खिड़कियों का ठीक से न बंद होना और न खुलना. बच्चे खिड़की पर हाथ रख बाहर का नजारा लेना चाहते हैं, पर डर लगा रहता कब शटर गिर पड़े. कई बार गिरते शटर से लोगों को घायल होते भी खुब देखा है.

आज की हमारी समस्या यह है कि शटर बंद नहीं हो रहे, ट्रेन के हिलने - डूलने के कारण पाँच मिनट में ही खिड़की खुद व खुद खुल जाते हैं. मतलब ऑटोमैटिक वातानुकूलन कर रहे दे रहें हैं कोच का. अब अन्दर बैठे लोग जो पहले से दुबके बैठे हैं, अपने हाथ को दोनों पैरों के बीच दबाए ठंड से बचने को वो ऑटोमैटिक वातानुकूलित हो रहे हैं. मेरी परेशानी तो एक घंटे की है. पर इस चिलचिलाती ठंड में जो भी यात्री नीचे के सीट पर पूरी रात यात्रा करेंगे, उनका कुल्फी जमना तय है. मतलब स्लीपर कोच में यात्रा करने के लिए कम्बल नहीं रजाई लेकर जाना पड़ेगा या फिर एक बढ़िया स्लीपिंग बैग. जिसमें घुस दुबका जा सके और कुल्फी होने से बचे.

वैसे हमारे यहाँ फिर भी थोड़ी राहत रहती है, क्योंकि ट्रेन में हमेशा ही सीट से ज्यादा यात्री होते हैं, जो कोच को ऑटोमैटिक वातानुकूलित होने से गर्मी देकर बचाए रखने में सहायक होते हैं.

बस यूँ ही

Wednesday, November 7, 2018

दीपावली और प्रदूषण - एक साजिश

दीपावली और प्रदूषण - एक साजिश  


किसने इन गधों को वैज्ञानिक और अनुसंधान करने की योग्यता की डिग्रीयां दी? जैसे मनमोहन सिंह अर्थशास्त्री कहलाने के लायक नहीं थे, उसी श्रेणी के ये गधे वैज्ञानिक और खानग्रेसी पर्यावरणविद  दीपावली से प्रदूषण होता है का हंगामा खड़ा किये हैं पिछले कुछ सालों से। क्रिसमस और नव वर्ष के उपलक्ष में भी उच्च वर्गो द्वारा जमकर आतिसबाजी की जाती है, लेकिन वो आतिसबाजी में प्रयुक्त पटाखे बिलकुल प्राकृतिक और हवन सामग्रियों से बनाया जाता है, जिससे वातावरण शुद्धि होती है।

गधे वैज्ञानिक, मुल्ले मीलॉर्ड और खानग्रेसी पर्यावरणविदों अब बताओ ये दीपावली के दो दिन पहले वायु प्रदूषण 20 गुणा कैसे बढ़ गई दिल्ली में ??? क्या तेरे बाप - नाना - दादा स्वर्ग में आतिसबाजी कर रहें हैं जिसका प्रदूषण दिल्ली तक पहुंच गई???

इन गधों को यही समझ नहीं आता यह समय गर्मी और सर्दियों के बीच का है, जिसमें वायु घनीभूत हो रही है, गंदी हवा को नीचे से ऊपर जाने से रोक रही है। जिसके कारण कोहरे जैसा दिख रहा है और वायु प्रदूषित हो रहा है। यह कोई नई बात नहीं है, हर वर्ष ये सिलसिला चलता आया है और 100% पटाखे चलाने पर प्रतिबंध लगा देने के बाद भी ऐसे ही चलता रहेगा।

हिन्दुओं को भेड़ - बकरी समझने वाले लोग जब तक अपने कुंद मानसिकता और धर्म की राजनीति से बाहर आकर नहीं सोचेंगे तब तक ऐसे ही जोकरों की तरह मसखरी करेंगें टेलीविजन पर बैठ कर कर प्रदूषण पटाखों से बढ़ता है और अपने को बड़ा समझदार समझने वाले लोग चाय दुकान फेसबुक और ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया पर बैठ ज्ञान पेलेंगे।

Tuesday, November 6, 2018

दीपावली के बहाने - "हम किस गली जा रहे हैं"

दीये और बाती


दीपावली पर कब दीपक की जगह मोमबत्ती ने ले लिया हमें पता ही नहीं चला। पर पिछले कई सालों से हमने यह गलती सुधारी और वापस देशी बन गया और हम पारंपरिक दीये की दीपावली मनाने लगे, क्योंकि यह त्योहार कोई कैंडलावली तो है नहीं जो हम कैंडल जलाए और न ही अभी मैंने अपना धर्म बदल कर क्रिस्चन होने के बारे कुछ सोचा है।

दीपावली के दीये, पूजन सामग्री आदि - आदि की खरीद माताश्री ने की तो माताश्री बाजार में कैसे क्या हुआ बता रही थी और समाचार पत्र देख रहीं थी। मैं वही बैठा था तो मेरी नजर समाचार पत्र पर एक जगह जाकर अटक गई। प्रसंग वही था जो हमारे और माताश्री के बीच वार्तालाप का विषय था - दीये बेचने वाले गरीब की दीपावली में स्थिति । समाचार और माताश्री के बात का निचोड़ -

पिछले चार दिनों से मिट्टी के दीपक बेचने वाले गरीब की दीपावली के दो दिन पहले हालत ये  थी कि बेचारे ने 100 रुपये में 100 दीये के मूल्य पर 400 रुपये की भी बिक्री नहीं की। जबकि वही बगल में मोमबत्ती बेचने वाले सेठजी के पास भीड़ उमड़ी पड़ी थी। उस दीये वाले गरीब के छोटे - छोटे बच्चे नए कपड़े की जिद कर रहे हैं इस दीपावली, जो कि मुश्किल से सभ्‍य लोगों के टेबल की शोभा छोटे पिज्जा के मूल्य पर ही हो जाएंगे, पर हाय रे तेरी किस्मत!

पत्रकार महोदय को गरीब दीयेवाले की बताते बताते आँखे छलछला आई -

 "बच्चबन के एकगो नया कपड़ों और दुई गो लड्डू न दिलाभे पारिबे अबकी लागै छै ।"

यह है हमारे दीपावली मनाने का तरीका। सेठ और माल से मोमबत्ती खरीद लेंगे, 1000 से 2000 रुपये किलो की मिठाई, चाइना के झालर 2000 - 4000 रुपये के घर के बाहर टाँग देंगे, वो भी बिंदास सीना ठोकर की हम तो चाइनीज ही लगाएंगे। पटाखे को कोई कैसे भूल सकता है, इसके बिना तो लगेगा ही नहीं कि हम हिन्दु हैं तो हिन्दू सिद्ध करने के लिये मात्र 5000 रुपल्ली क्या चीज है भई  

पर वो गरीब जो महीनों से अपने बच्चो को नए कपड़े और मात्र दो अदद लड्डू देने का वादा भी पूरा न हो पाने के सदमे में दिल से रो रहा है, याद रखो उसकी हाय भी दीपावली के मंगलमय वातावरण में हमारे ही आसपास मंडराने वाली है और दीपावली में आपके घर लक्ष्मीजी आये या न आये, पर ये गरीब की हाय तो कही दूसरे ग्रह नहीं पर नहीं जाने वाली।

वैसे हमने या आपने क्या इनका ठेका ले रखा है, अपनी-अपनी किस्मत है। मरने दो इनको इनके हाल पर।

Let's Start Our Party. Wish You a Very Happy & Prosperous Deepawali. 

गरीब तेरी यही कहानी,
दिल में दर्द और आंखों में पानी।

Wednesday, August 29, 2018

केश कर्तनालय गाथा

आज दफ्तर का साप्ताहिक अवकाश का दिन है, ये इसलिये बता रहा हूँ कि इस प्राणी का रविवार नहीं होता | अभी बिस्तर पर निद्रा देवी की आगोस से अलसाया उठा ही था और मदहोशी छाई हुई ही थी कि सुबह-सुबह बेटे ने गुसलखाने में घुसने के पहले ही तुगलकी फरमान सुना दिया –
आज पापा मुझे स्कूल बस में छोड़ने जायेंगे, नहीं तो मैं स्कूल नहीं जाऊंगा|

छुट्टी का दिन मतलब एक दिन की बेरोजगारी | श्रीमतीजी ने भी मुस्कराते हुए कहा छोड़ आइये ना आप ही | बेचारा शादी-शुदा निरीह-सा आदमी नामक प्राणी कर भी कर सकता है इस परिस्थिति में | मैं भी घुस गया जल्दी से दूसरे गुसलखाने में, आखिर बस स्टैंड पर छोड़ने जाने के पहले नित्य-क्रिया से निवृत होने के साथ थोबड़े को थोड़ा दुरुस्त तो करना ही था | बेटे के तैयार होते-होते मैं भी तैयार होकर अपनी फटफटिया निकाली और नखरिले नटखट को बस स्टैंड छोड़ आया |

घर वापसी के पहले अपने हवाओं में लहराते टेढ़े-मेढे जुल्फों को थोड़ा रास्ते पर लाने के लिए केश कर्तनालय का रुख किया | अपने पसंदीदी केश कर्तनालय में घुसने के पहले बता दूँ, ये है तो छोटा सा केश कर्तनालय पर नये-नवेले लौंडों की भीड़ मधुमक्खी के छत्तें की तरह लगी रहती है | कारण... कारण ये है कि राजा जो इस केश कर्तनालय के संचालक हैं के साथ में जादू है | आपको चाहे किसी भी फ़िल्मी हस्ती के घोसले को अपने खोपड़ी पर बनवानी हो या खोपड़ी को आजकल की नई चलन के हिसाब से आधी सफाचट, आधी घोसले में तब्दील करवानी हो, सब करता है ये राजा भाई और वो भी बिना जेब काटे | मैं इतना क्यों बता रहा हूँ इस केश कर्तनालय के बारे में, कहीं ये कोई प्रोमोशनल या स्पोंसर्ड पोस्ट तो नहीं???

अरे नहीं भाई, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं, असल में यही तो मेरे दुःख का कारण हैं | मैं अपनी जुल्फों की कटाई- छंटाई तब तक टालता रहता हूँ, जब तक मेरी शक्ल भालु जैसी नहीं हो जाती | इसका कारण है केश कर्तनालय में जमी मधुमक्खी के छत्तें सी भीड़, जिसके कारण अपनी पारी के इंतजार में दो-दो घंटे बिताने पड़ते हैं | और आज तो छोटे नवाब की भी जुल्फों को सवारना था, जो भालू जैसी हुई नहीं थी पर अगले साप्ताहिक अवकाश तक हो ही जाने वाली थी | मतलब आज ढाई-तीन घंटे का सत्यानाश वो भी उस साप्ताहिक अवकाश वाले दिन जो पन्द्रह दिनों  बाद मिल रही हो | खैर किया क्या जाये, कहीं और जाने से संतुष्टि भी नहीं मिलती | लेकिन जैसे ही अपनी फटफटिया बाहर खड़ी कर अन्दर गया तो पता चला कि आज भीड़ नहीं है और एक, जिनकी लहलहाती हरी-भरी जुल्फों की बगिया को बेरहमी से रेगिस्तान बनाया जा रहा था के बाद मेरे ही खोपड़ी पर कैची और उस्तुरा वाला हाथ फिरने वाला था | खैर, लगभग पन्द्रह मिनट में अपनी बारी आ गई और अपनी जुल्फों की कटाई-छंटाई, खाद-पानी का काम इतनी जल्दी निपट जाने से मन ही मन खुश भी था |

अब आप कहेंगे बेकार ही इतना चिल-पो कर रहा हूँ और एक फालतु पोस्ट भी लिख डाला | रुकिए ... रुकिए मेरा दुःख अभी समाप्त नहीं हुआ | छोटे नवाब को छुट्टी के बाद लेकर जब दोपहर में वापस उसी केश कर्तनालय पहुँचा तो पता चला कि पांच-छः लौंडे जमें हैं पहले से | मतलब कम-से-कम ढाई-तीन घंटे तो लगने ही थे | फिर सोचा नहीं इतना समय नहीं दे सकता तो चल पड़ा दूसरे केश कर्तनालय की ओर जो पास में ही था | वहाँ भी चार लोग जमें थे तो फिर तीसरी केश कर्तनालय में चला गया | हाँ, यहाँ भीड़ नहीं थी, सुबह जैसे मुझे संयोग से ऐसा मिल गया था मेरे पसंदीदा केश कर्तनालय में सिर्फ एक | कुछ ही देर में छोटे नवाब ठाठ से बैठ अपना केश बनवा रहे थे और मैं बैठा सोच रहा था क्या हम पुरुष अपनी केश की थोड़ी-मोडी कटाई-छंटाई खुद से घर पर नहीं कर सकते क्या ??? कुछ तो जुगत लगानी पड़ेगी, अब इतने समय की बर्बादी मैं केश कर्तनालय में फालतु बैठकर तो नहीं कर सकता | 

जो रास्ते मुझे सूझ रहें हैं वो ये हैं :

१. पहला बात जो मेरे कुराफाती खोपड़ी में आ रही थी वो थी अपनी केश-सज्जा या कटाई-छंटाई खुद करना | अब वो बाद में कैसा दिखता हैं, ये देखने वाली बात होगी | लेकिन ये होगा कैसे ??? देखता हूँ, शायद कोई मिल जाये जुगत बताने वाला |


२. अपनी लहलहाती हरी-भरी जुल्फों की बगिया को, भले ही थोडा 
रेगिस्तानी इलाका भी है, बेरहमी से रेगिस्तान बना डालूं और उसे जैसे दाढ़ी बनाता हूँ वैसे ही क्रीम पोतकर चिकनाता रहूँ | केश कर्तनालय का जिन्दगी भर का झंझट ही खत्म |

३. जैसा चल रहा है वैसा चलने दूँ, बस कोई टुटपुंजिया-सा केश कर्तनालय की खोज कर लूँ ताकि अधिक समय बर्बाद ना करना पड़े | अब वो चाहे कैसा भी शक्ल बना दे, समय तो बचेगा |

यही थी मेरी बड़ी परेशानी, मेरी समस्या |

Tuesday, July 16, 2013

समस्या स्वर्ण की …..





आज ही हमारे वित्तमंत्रीजी का एक बयान देखा जिसमे उन्होंने हिन्दुस्तान के लोगों को सलाह दी है कि लोगों को स्वर्ण एवम स्वर्ण निर्मित आभूषणों के प्रति मोह छोर देना चाहिए | क्यूंकि इससे देश को काफी नुकसान उठाना पर रहा है और देश की अर्थव्यवस्था सिर्फ लोगों के स्वर्ण एवम स्वर्ण निर्मित आभूषणों के प्रति मोह के कारण बेपटरी हुई जा रही है | मैंने जब वित्तमंत्रीजी के बयान पर गहन विचार किया तो भाई मैं तो समुंद्र में उठने वाले ज्वार-भाटा के सामान विचारों के भवर में उलझ गया | मुझे लगता है कि हमारे वित्तमंत्रीजी ने काफी रिसर्च किया है इस मुद्दे पर, और उन्होंने कसम खा ली है कि चाहे जो हो जाए पर लोगों के स्वर्ण के मोह को वो भंग करके ही रहेगे | तभी तो स्वर्ण के खरीद-बिक्री पर वित्तमंत्रीजी जी पाबंदी लगाने के लिये तरह-तरह के नुस्खे आजमा रहें हैं, जिसके कारण बेतहाशा बेलगाम होती महँगाई पर ध्यान देने के लिये उन्हें समय ही नहीं मिल पा रहा है | भाई, अब बात ये है कि एक ही आदमी से कितना काम करवाओगे | बेचारे वित्तमंत्री ठहरे एक और काम अनेक | क्या-क्या देखे बेचारे … भुखे-नंगे लोगों को सुने जो फालतु में महँगाई-महँगाई चिल्ला रहें हैं | अब मूर्खों जनता को कौन समझाये कि भाई महँगाई ज्यादा होने से ये पता चलता है कि देश तरक्की कर रहा है और सब के पास धन-दौलत मौजुद है | या इस डालर को संभाले जो बिरोधियों के इशारे पर नाच रही है | या फिर पेट्रोल की कीमत को संभाले जो अमेरिका की इशारे पर हमारे वित्तमंत्री को बदनाम करने में लगा है | एक आदमी को अगर इतने सारे मुद्दे सुलझाने हों तो जाहिर सी बात है कोई भी हो, आखिर शुरुआत तो एक से ही करेगा ना | तो भाई आपलोग थोडा इन्तजार करो | जैसे ही वित्तमंत्रीजी स्वर्ण की समस्या को सुलझा लेंगे, बाकी समस्यों पर भी ध्यान देंगे |

Tuesday, December 6, 2011

टेक गुरु ...



आज इन्टरनेट और तकनीक का कमाल ही है की भागलपुर में बैठकर दिल्ली के किसी भी इलाके की जानकारी मिल जाती है, और तो और वाकायदा इलाके की सेटेलाइट से ली गईं तस्वीर भी उपलब्ध हो गई| है ना तकनीक का कमाल|


असल में हुआ यूं की मेरे एक मित्र ने दिल्ली से ही फोन किया की भाई साहब, जरा मुझे दिलशाद गार्डन से नॉएडा जाने का मार्ग बताएँ| अब चुकीं ये बात ठीक है की मैं काफी दिनों तक दिल्ली में रहा, पर मियां ये जरूरी तो नहीं की मैं दिल्ली के हर इलाके को जानू| लेकिन जनाब को मैं अपने ज्ञानी होने पर संदेह नहीं होने देने चाहता था, और दुसरी बात ये भी थी की जनाब कुछ परेशान भी थे, इस वजह से उनसे ये कहकर की मुझे रास्ता नहीं मालूम और परेशान नहीं करना चाहता था| खैर मैंने कहा भाई, मैं आपको बस कुछ देर में कॉल बैक करता हूँ, उन्होंने झट से कहा की बिजी हो क्या ? इक बार तो मैंने सोचा की उन्हें बता दूं की मुझे रास्ता नहीं मालूम, पर जैसे ही उन्होंने कहा बिजी हो क्या? तो मैंने भी सोचा क्यों अपनी इज्जत अपने साथ से उतारू और मैंने भी कह दिया हाँ |

झट से मैंने अपने इंटरनेट (मायाजाल) चालू किया और गूगल मैप पर पहुँच गया| और बस और क्या चाहिये था| बस कुछ मिनटों में रूट की सारी जानकारी मेरे पास थी, जो की मैंने नोट कर ली की कहीं भूल ना जाऊ| और दस मिनिट्स में मेरे फोन करने के पहले जनाब का ही फोन आ गया| और फिर क्या था मैंने बड़े शान और रौब से जनाब के सारा रूट बकायदा टर्न, फ्लायओवर और लाल बत्ती के उन्हें समझा दिया| जनाब तो खुश हो ही गए बोले मुझे पता था आपके अलावा मुझे और कहीं से सही जानकारी नहीं मिलेगी| मैं तो इन्टरनेट की वजह से ज्ञानी बना रह गया और लगे हांथों जनाब को दिल्ली मैप रखने की सलाह भी दे डाली| उन्होंने भी कहा ठीक कहा भाई, दिल्ली जैसे बड़े शहर में तो बिना मैप के कहीं जाने-आने में बड़ी पड़ेशानी होती है|

अब मैं आपलोगों को इस पुरे कहानी की सब से अहम बात बताता हूँ| ये वो जनाब हैं जो पुरे दिन इन्टरनेट और फेशबुक पर उपलब्ध रहते हैं. लेकिन जब ट्रेन टिकेट्स की जरुरत होती है तो रिज़र्वेशन काउन्टर की ओर दौड़ते हैं और जब किसी नये जगह जाने की बात होती है तो लोगों से पूछते फिरते हैं|

इसलिए कहता हूँ सिर्फ स्मार्टफोन रखने से कोई ना तो स्मार्ट बन जाता है, जब तक की उसे स्मार्टली इस्तेमाल करना ना आता हो, और लैपटॉप, कंप्यूटर और इन्टरनेट रहने से ही बन्दा टेक गुरु नहीं हो जाता| जबतक की उसका सही इस्तेमाल करना नहीं आता हो|

Sunday, November 16, 2008

बदलती मान्यताएँ ....



हम और हमारा समाज कितनी तेजी से बदल रहा है इस बात का एहसास अभी कल ही हुआ। पुरानी परंपराए और मान्यतायें तो जैसे बिल्कुल ही बकबास हो गई है आज के युवा पीढी के लिए। अगर इनका बस चले तो इन्हें कब्र में डालकर इसका अन्तिम संस्कार कर और उसके लिए उन्हें पछतावा भी नही हो।

हुआ यूँ की मेरे एक क्लाइंट का लड़का काफी दिनों से स्वाश्थ्य सम्बन्धी समस्यों से जूझ रहा था। कई बार कहने पर भी वो मुझ से मिलने के लिए तैयार नही था। जब परेशानी हद से ज्यादा बढ़ गई तो पेरेंट्स (हाई सोसायटी की बात है भाई माता पिता कहने से निम्न वर्ग की बू आती है) के गुस्साने पर मुझ से मिलने को तैयार हुआ ताकि उसके स्वास्थय से सम्बंधित समस्या को सुलझा सकूँ। बातचीत के क्रम में पता चला की महाशय को छोटी-बड़ी कई समस्याएँ हैं। २५ वर्ष की उम्र में ही बुढापे के सारे लक्षण मौजूद है। कन्धा झुका हुआ, आधे बाल सफ़ेद, खुलकर भूख नही लगना, सर दर्द, पेट दर्द, कब्ज और तो और सब से बड़ी मुसीबत नींद नही आना। खाना पीना के बारे में तो पूछिये मत। पेट को तो बेबकूफ ने कूडेदान बना रखा है | घर का खाना तो मिस्टर स्मार्ट को कुत्तों का खाना लगता है | जब भूख लगेगी तो मेकडोनाल्ड, नरूला, पिज्जा हट, के.फ.सी का रूख करते है | और सुनिए सोने का तो कोई टाइम ही नही है | रात को मिस्टर स्मार्ट २-३ बजे तक तो पार्टी में ही व्यस्त रहते है | हर दिन लेट नाईट पार्टी | वाह, नीली छतरी वाले तुने भी अपनी इस दुनिया में क्या-क्या बनाया। कोई तो बस इक रोटी के बिना भूखा मर रहा है और इक ये सभ्रांत कहलाने वाले लोग हैं, जो हर रात हजारों रूपये बस मस्ती, मदिरा, और अपने जूनून और हवस की भूख मिटाने के लिए खर्च करते है। वाह नीली छतरी वाले, वाह तेरी भी दुनिया निराली है।


सब कुछ काफी देर तक सुनते रहने और उसकी समस्या को समझने के बाद मैंने जब उस बेचारे (जवानी में बुढापा को बुला ले, उसे बेचारा नही तो क्या कह सकते है ) को अपने लाइफ स्टाइल को बदलने की बात की तो उसने साफ़ साफ़ मना कर दिया । उसे तो बस कोई अलाह्दीन का चिराज चाहिए था जो झट से उसकी सारी समस्यों को सुलझा दे, बिना किसी खिटपिट। सबसे दिलचप्स बात तब हुई जब मैंने उसे कहा की चलो कोई बात नही, तुम सिर्फ़ इतना करो की रात में टाइम पे सोने की कोशिश करो। उसने पुछा क्या मैं आप से इक बात पूछ सकता हूँ, मैंने बोला पूछो। 
उसने सीधा सा इक सवाल पुछा- "आप की समझ से हमे कितने बजे सो जाना चाहिए और आप कितने बजे सोते हो ?"  
मेरे इस जवाब को सुनकर की १०-११ बजे तक सो जाना चाहिए (दिल्ली की परिस्तिथि में)। वो मुस्कराया और धीरे से बोला और 
"आप कितने बजे सोते हो?" 
मैंने कहा १० तक तो किसी भी हालत में सो जाता हूँ । और सेहत ठीक रखनी है तो "Early to Bed and Early to Rise, Makes a Man Healthy, Wealthy and Wise" का मंत्र समेसा याद रखना चाहिए | उस मिस्टर स्मार्ट ने झट से जवाब दिया 
"Early to Bed and Early to Rise, Makes Your Girl Friend Run Away with Other Guys"

अब मेरे पास कोई जवाब नही रह गया था उस मिस्टर स्मार्ट को देने के लिए, सो चुपचाप निकल लिया। रास्ते में सोचता जा रहा था : "क्या गर्ल फ्रेंड आज सेहत और जिन्दगी से ज्यादा important है।" मुझे तो जवाब नही मिल पाया। अगर आपको जवाब मिल जाए तो कृपया हमें भी बताये।

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