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Sunday, June 28, 2020

सबसे बड़ा आतंकवादी

क्या आप जानते हैं आज देश का सबसे बड़ा दुश्मन कौन है?

देश का सबसे बड़ा दुश्मन आज आतंकवादी, जेहादी, पाकिस्तान, नेपाल या चीन नहीं...
आज देश का सबसे बड़ा और खतरनाक दुश्मन है आपके और हमारे शहरों, नगरों, गावों के बाजारों, सड़कों, गलियों और समाज में बिना सुरक्षा उपायों और मास्क के घूमते-मंडराते लोग. यही वो लोग हैं, जिन्होंने हमारा और आपका जीना हराम कर दिया है. यही वो लोग हैं जिनकी वजह से कोरोना नित नए चरम पर जा रहा है. बॉर्डर पर जो भी देश के दुश्मन हैं, वो तो साफ दिख रहे हैं और उनसे हमारे बहादुर सैनिक निपट ही लेंगे. पर हमारे बीच जो ये कोरोना आतंकवादी घूम रहे हैं, इसे तो सरकार गोली भी नहीं मार रही.
सावधान रहिये ऐसे लोगों से. यही देश के सबसे बड़े आतंकवादी हैं... कोरोना आतंकवादी.

Sunday, June 21, 2020

आज के दिन सब योगी हैं !

आज पूरी दुनिया में दो घटनाएँ एक साथ घट रही है.
पहला तो आज अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस है और दूसरा साल का सबसे बड़ा सूर्यग्रहण चल रहा है. इस ग्रहण में हम 900 साल के बाद वलयाकार सूर्यग्रहण को देख सकेगें. अगला सूर्य ग्रहण शायद भारत में ग्यारह साल बाद दिखाई देगा, जो 21 मई 2031 को होगा, जबकि 20 मार्च 2034 को पूर्ण सूर्यग्रहण देखा जाएगा.
आज के दिन सब योगी हैं. योगी, भोगी, रोगी और भोयोगी सभी योग दिवस की शुभकामनाएं दें रहे हैं और अपनी फोटो सबके साथ शेयर कर रहे हैं. पर मेरे लिए 21 जून एक सामान्य दिन की तरह ही है. सूर्यग्रहण चल रहा है यही विशेष है. योग तो जीवन का हिस्सा ही है. फिर इसके लिए एक दिन योग दिवस मनाने की जरूरत मुझे महसूस नहीं होती. हाँ, ये दिन उनके लिए विशेष हो सकता है, जिनको पुरे साल इस दिन का इंतजार रहता है. ताकि योगाभ्यास करते हुए कुछ फोटो लेकर मित्रों को दिखा सकें. मतलब बस एक दिन योगाभ्यास कर ऐसे लोग पुरे साल उर्जा प्राप्त करते हैं.
एक दिन योग दिवस मनाकर, जीवन में कुछ हासिल होने वाला नहीं. इस योग दिवस को सफल तभी कहा जाएगा, जब हम इसे अपने दैनिक जीवन में स्थान दें. योग को जीवन का हिस्सा बनाइये, योग आपको निर्मल और स्वस्थ शरीर प्रदान करेगा.
जय हो !

Thursday, June 18, 2020

चलो Tik Tok... Tik Tok करें

लद्दाख के अभियंता और जाने-माने शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk).

चीन के साथ 44 दिनों से बढ़ते तनाव के बीच, लद्दाख में सोमवार को हुए खुनी संघर्ष में 20 भारतीय जवानों ने अपनी बलिदान दे दी. सेना के जवान दुर्गम क्षेत्र में जान की परवाह न कर भी डटी रहती है, ताकि हम सुरक्षित रह सकें. ताकि हम चायनीज TikTok पर वीडियों बना सकें, चाइनीज मोबाइल खरीद के साथ सस्ते सामान खरीदकर चीन की झोली भर सकें. उसी पैसे का इस्तेमाल दुष्ट चायनीज सरकार अपनी दुष्ट विस्तारवादी नीति के लिए कर सके. अपनी विस्तारवादी नीति के कारण ही आजादी के बाद से वो हमारी हजारों किलोमीटर जमीन हथिया चूका है, अब जब उसे कड़ा जवाब मिल रहा है. उसके डर से हमारे जवान पीछे नहीं हट रहे तो हमारे जवानों को धोखे से क़त्ल करने के लिए भिड़ा, ये अलग बात है कि हमारे जवानों ने एक के बदले दो को लुढका दिया और जैसे को तैसा जवाब दिया.  पर आप जारी रखों अपना TikTok. हाँ, अपना नया फोन भी चायनीज लेने की जो प्लानिंग कर रखी है. 
ले लो... हाँ... हाँ ले लो. अरे, सेना के जवान ही मरे हैं, हम थोड़े मरे रहे हैं. जो सेना और देश के बारे में सोचें. 


लद्दाख के अभियंता और जाने-माने शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) ने अपने यू ट्यूब चैनल पर चाइना के सामानों के बहिष्कार की अपील की थी. जिसका परिणाम ये हुआ कि चीन ने घबराकर गूगल प्ले स्टोर से चायना की एप्प्स को खोजकर बताने वाले भारतीय एप्प को हटवा दिया. पर इन सबसे आपको और हमको क्या लेना है. हम थोड़े ना सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) को जानते हैं. हमें क्या करना उनके बहिष्कार की अपील की. आप लगे रहो अपने TikTok वीडियों पर. सोनम वांगचुक को कोई कामधंधा नहीं है, जो देश के बारे में सोचते रहते हैं. आप बढ़िया वीडियों बना रहे हो, लगे रहो. 
देश रहे या जाए, हमें क्या करना. 
अपना TikTok वीडियों और चायना का फोन जिंदाबाद. 


अब कई बहुत ज्यादा दिमाग वाले लोग ये भी कहेंगे कि सरकार तो कुछ कर नहीं रही हमारे बहिष्कार करने से क्या होगा. तो आपको बता दूँ सरकार क्या करेगी और क्या नहीं वो सरकार का मामला है और विदेश नीति के साथ व्यापार नीति का मामला है. पर हमें चीनी सामान के बहिष्कार करने में कोई नीति रोक नहीं सकती. वैसे बीएसएनएल के बाद रेलवे ने भी चीन की कंपनी के साथ 471 करोड़ का करार रद्द करने का फैसला ले लिया है है. रेलवे ने कहा है की काम की रफ्तार धीमी होने के कारण कॉन्ट्रैक्ट को रद्द कर रहे हैं. पर इससे हमें क्या करना है. हम तो Tik Tok बनाने में मस्त और व्यस्त हैं. वैसे कम अक्ल होने का यही तो प्रमाण हैं.

किसने कहा जो चीनी आइटम ले रखा है उसे तोड़ दो, फोड़ दो. अरे शुरुआत तो कर सकते हैं. चीनी सामानों को ना तो कह सकते हैं. आज एप्प को फोन से हटाने से शुरू करेंगे तो धीरे-धीरे फोन और अन्य उपकरण खरीदने के पहले ये देखने की आदत भी पड़ जायेगी कि वो चाइनीज ना हो. ऐसा भी नहीं है कि हम इन तीन फुटियें के सामान के बिना जीवन ही नहीं जी सकते. पर नहीं हमें क्या करना है. सबकुछ ऐसी ही चलता रहता है, अपनी ख़रीददारी जारी रखिये. सेना के जवान ही मरे हैं, हमें क्या करना.

हमारी खुफिया एजेंसियों ने 50 चाइनीज ऐप्स की लिस्ट जारी की है. जिन्हें देश और आपके सूचनाओं के लिए भी खतरनाक बताया गया है. इसमें सबसे पहले नंबर पर वही TikTok है, जिसमें मटक-मटक के आप वीडियों बना अपने मानसिक दिवालियेपन को दुनिया के सामने, खुद ही रख रहे हो. पर इससे भी हमें क्या करना है, चलिए हम फिर से मटक-मटक के एक नया वीडियों बनाते हैं. अरे उसी TikTok पर, जिसकी आपको लत पड़ चुकी है. दिमाग के अन्दर सिर्फ और सिर्फ घासफूस ना भरी हो, तो आप भी अपना मोबाईल चेक कर इस लिस्ट से मिला लो. उसके बाद क्या करना है वो आप खुद दो मिनट आँखें बंद कर सोचों, सोचो उस निहत्थे शहीदों के बारे में जिन्हें तीन फुतिये लोगों ने छल से मार डाला. जवाब खुद ब खुद मिल जायगा. अंत में बस एक प्रसिद्द शेर से अपनी बात ख़त्म करता हूँ-
कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों.

खुफिया एजेंसियों ने इन 50 खतरनाक चाइनीज ऐप्स की लिस्ट जारी की :

टिक-टॉक (TikTok)
हेलो (Helo)
यूसी ब्राउजर (UC Browser)
यूसी न्यूज (UC News)
शेयर इट (Sharit)
लाइकी (Likee)
360 सिक्योरिटी (360 Security)
न्यूज डॉग (NewsDog)
शिन (SHEIN)
विगो वीडियो (Vigo Video)
वी चैट (WeChat)
वीबो (Weibo)
जूम (ZOOM)
वीबो लाइव (Vibo live)
क्लब फैक्टरी (Club Factory)
शेंडर  (Xender)
ब्यूटी प्लस (BeautyPlus)
क्वाई (Kwai)
रोमवी (ROMWE)
फोटो वंडर (Photo Wonder)
एपीयूएस ब्राउजर (APUS Browser)
वीवा वीडियो (VivaVideo)
क्यूयू वीडियो इंक (QU Video Inc)
परफेक्ट कोर्प (Perfect Corp)
सीएम ब्राउजर (CM Browser)
वायरस क्लीनर (Virus Cleaner)
हाई सिक्योरिटी लैब (Hi Security Lab)
एमआई कम्यूनिटी (Mi Community)
डीयू रिकाॅर्डर (DU recorder)
यूकैम मेकअप (YouCam Makeup)
एमआई स्टोर (Mi Store)
डीयू बैटरी सेवर (DU Battery Saver)
डीयू ब्राउजर (DU Browser)
डीयू क्लीनर (DU Cleaner)
डीयू प्राइवेसी (DU Privacy)
क्लीन मास्टर (Clean Master)
बैदू ट्रांसलेट (Baidu Translate)
बैदू मैप वंडर कैमरा (Baidu Map Wonder Camera)
ईएस फाइल एक्पलोरर (ES File Explorer)
क्यूक्यू इंटरनेशनल (QQ International)
क्यूक्यू लाॅन्चर (QQ Launcher)
क्यूक्यू सिक्योरिटी सेंटर (QQ Security Centre)
क्यूक्यू प्लेयर (QQ Player)
क्यूक्यू म्यूजिक-क्यूक्यू मेल (QQ Music QQ Mail)
क्यूक्यू न्यूज फीड (QQ NewsFeed)
वी सिंक (WeSync)
सेल्फी सिटी (SelfieCity)
क्लैश ऑफ किंग्स मेल मास्टर (Clash of Kings Mail Master)
एमआई वीडियो काॅल-शाओमी (Mi Video call-Xiaomi)
पैरेलल स्पेस (Parallel Space)

Sunday, June 14, 2020

सूसाइड और हमारा समाज


एक्टर सुशांत सिंह राजपूत का इस तरह सूसाइड कर लेना, बहुत दुखद खबर है. श्रीमती ने अभी बताया, उन्हें भी बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाते वक्त शायद वीडियों दिख गया. मैं तो समाचारों से मतलब ना के बराबर ही रखता हूँ. समाचार ऑनलाइन सर्च किया तो पता चला कई हित फिल्मों में अभिनय कर अपनी धाक जमा चुके थे. मैं फ़िल्में देखता नहीं, इसलिए नाम से भी वाकिफ नहीं था. हाँ, यहाँ-वहाँ फिल्म के पोस्टर पर कई बार ये चेहरा देख चूका था.

डिप्रेशन या अवसाद किस कदर लोगों को लील रहा है. ये इसका उदाहरण है. कोरोना काल में लम्बे समय तक घरों में बंद होने से इसे और सबल मिला. एक्टर सुशांत सिंह राजपूत जैसे एक्टर का ऐसा करना, दर्शाता है कि लोग अपनी स्ट्रेस को मैनेज नहीं कर पा रहे हैं. लोगों को ये पता नहीं कि हाई लेवल के स्ट्रेस को कैसे मैनेज करें. कोरोनाकाल के लॉक डाउन में कई लोगों को फ्री सलाह दी. कई मित्रों ने इसका फायदा उठाया और आज खुश हैं. बार-बार धन्यवाद कहते हैं. अवसाद से निकलने और जीवन के हारते पल में बस एक तिनके का सहारा भी काफी होता है. 

हम सबकुछ करते हैं, सीखते हैं. पर भारत में कुछ चीजों पर कोई सीख ना समाज से मिलती है और ना परिवार से. एजुकेशन सिस्टम की तो बात करनी ही बेकार है. भारत में सबसे पहली चीज, जिसपर कोई बात करना नहीं चाहता वो हैं पैसा. मतलब मनी मैनेजमेंट पर कोई बात करना नहीं चाहता. पैसे पर बात करना भारत में एक टेबू है. जिस तरह से सेक्स पर बात करना एक टेबू है. सेक्स और उससे जुडी समस्या भारत में सबसे गंभीर रूप इसलिए ले लेती है. कोई खुलकर इसपर बात करना तो क्या, सोचना तक नहीं चाहता.

उसी कड़ी में स्ट्रेस भी एक विषय है, जो ऊँचे-ऊँचे खवाब, कामयाबी और भागदौड़ भरी जिन्दगी में बेहिसाब बढ़ रही है. पर स्ट्रेस मनेजमेंट कैसे करें, ये अधिकतर लोग समझ नहीं पाते. मैं हमेशा इस बात पर बल देता हूँ की हर इंसान को अपने अन्दर दबे पड़े हॉबी, हुनर, शौक की खोज करनी चाहिए. जिसे एक जूनून की तरह पालना चाहिए. बिना किसी शौक या हॉबी और हुनर क्या इन्सान को सच में इन्सान कहा जा सकता है. मैं हमेशा कहता हूँ, ऐसे इन्सान दोपाया जानवर से ज्यादा कुछ नहीं. कई लोगों को बहुत बुरा है. पर सच्चाई यही है. यही बेहिसाब बढ़ते स्ट्रेस को मैनेज करने का मैजिक फार्मूला है. इसके साथ एक्टिव लाइफ स्टायल जीना भी बेहद जरुरी है. हमेशा एक्टिव रखिये खुद को. एक्टिव पर्सनालिटी के लोग कभी स्ट्रेस से डिप्रेशन में नहीं जा सकता. डिप्रेशन अधिकतर सुस्त और आलसी लोगों को अपने चपेट में लेता है. पुरे दिन बिस्तर पर पड़े रहना, टीवी के सामने बैठे रहना ये सब सुस्त और आलसीपन के ही लक्षण हैं.

योग को जीवन का एक हिस्सा बनाए. योग जीवन के हर मोड़ पर, हर असफलता को अपनाना सिखाता है. योगाभ्यास से स्ट्रेस और डिप्रेशन को बहुत ही आसानी से मैनेज किया जा सकता है. योग और वाक से स्ट्रेस लेवल आश्चर्यजनक रूप से कम किये जा सकते हैं. पर सबसे जरुरी बात ये है की इसके लिए कदम आपको खुद ही उठाना पड़ेगा. ये सब कोई दूसरा आपके लिए नहीं करेगा. जीवन लीला समाप्त कर लेना भी बहुत आसान फैसला नहीं है. मैं तो मानता हूँ सूसाइड करने के लिए भी बड़ा कलेजा चाहिए. इसी हिम्मत को अगर जीवन के उस स्ट्रेस, अवसाद, परेशानी से लड़ने में लगा दें, तो जरुर कामयाबी मिलेगी. पर लोग हमेशा शार्टकट की ओर भागते हैं और जीवन लीला समाप्त कर लेना ही आसान रास्ता नजर आता है.


अपने लाइफ स्टाइल को ठीक करिए, एक्टिव रहिए. जीवंत और एक्टिव बनने के साथ परिस्थिति के साथ चलना सीखिए. अपने हॉबी, शौक की खोज करिए अगर आज तक नहीं खोज पाए. हर किसी का कोई ना कोई शौक या हॉबी होता है, जो जीवन के भागदौड़ में कहीं दम तोड़ देते हैं. आपकी शौक या हॉबी मूड बूस्टर की तरह होते हैं, जो आपको रिचार्ज कर देते हैं. 

श्रीमद्भागवतगीता को अपनाइए. मेरा तो मानना है गीता MBA, इंजीनियरिंग जैसे हाइयर एजुकेशन में एक विषय के रूप में शामिल होना चाहिए. कोशिश कीजिये, एक गीता हमेशा आपके पास हो. डायरी से भी छोटी साइज में गीता प्रेस की गीता हिंदी, अंग्रेजी के साथ कई अन्य भारतीय भाषों में उपलब्ध है. आज भी गीता उतना ही सबल आपको और हम सबको दे सकता है, जितना युध्भूमि में इसके ज्ञान ने अर्जुन को सबल दिया था. इसे जीवन का अंग बनाइये, पढ़िए. गीता जीवन के हर मोड पर रास्ता दिखाने में सक्षम है. 

Tuesday, June 2, 2020

अनलॉक-1.0 : जिन्दगी और कोरोना


लॉक डाउन के 68 दिन बीत गए. जिन्दगीं ये 68 दिन ऐसे हैं, जिसे शायद हर कोई अपने जिन्दगीं के पन्नों से फाड़ फेकना चाहता है. 1 जून से देश अनलॉक हो रहा है, अनलॉक-1.0 के साथ जैसे कैद के पंक्षी को खुला आसमां मिल गया और धीरे-धीरे देश में सबकुछ सामान्य करने की कोशिश की जा रही है. 
तो क्या अनलॉक-1.0 के साथ कोरोना हार गया ? 
ख़त्म हो गया कोरोना ?

ऐसा बिलकुल नहीं है. अनलॉक-1.0 ऐसी स्थिति हैं, जहाँ आप और हम देश में कोरोना के आंकड़ें दिन ब दिन बढ़ते देख रहें हैं, स्थिति पहले से ज्यादा बदतर हो रही है. लोग मौत के मुंह में भी जा रहे हैं. पर आज न कल देश को बाहर निकलना था. कामधंधे-उद्योग-दुकानों को खोलना था, जिसने अपूरणीय क्षति झेली है.

जब साँस लेने से जिन्दगीं जा सकती हो, छूने से मौत गले लगाने को तैयार बैठी हो. मानवता का सबसे बड़ा मन्त्र सामाजिकता और मिलना-जुलना ही मानवता के लिए खतरा बन गए हों. ऐसे में अनलॉक-1.0 से पटरी पर लौटती जिंदगी में अपने तौर-तरीकों को बदलना होगा, भले ये बदलाव हमें पसंद हो या ना हो. हमने काफी लम्बा लॉक डाउन देखा, कोरोना का कहर देखा. सरकार के बताएं सावधानी और बचाव के उपाय भी देश के हर नागरिक तक पहुँच गए. अब जब सबकुछ सामान्य करने की कोशिश की जा रही है, तो हमें और सावधान रहना होगा. अनलॉक-1.0 का मतलब कोरोना का खात्मा नहीं है, ये शायद हममें से कईयों को समझने की जरूरत है. 

हमें जिन्दगी को पटरी पर लाना है पर सावधानियों और बचाव के उपायों के साथ. हमें सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखते हुए, सामाजिकता निभानी होगी. कई लोग जो अति सोशल होते हैं उन्हें ये सावधानियां शायद एंटी सोशल लग सकते हैं. पर ये एंटी सोशल आपकी, हमारी और हम सबकी जान बचने का मंत्र होगा आगे कई महीनों तक. साफ-सफाई और पर्सनल हाइजिन के प्रति पहले से अधिक सचेत रहना होगा. इस बात को समझने का प्रयास कीजिये, जब हम घरों में बंद थे, तो कोरोना के मरीजों की संख्या भी कम थी और और ये सीमित स्थानों और शहरों तक ही सीमित थे. पर प्रवासियों के लाखों की संख्या में घर वापसी, हवाई और रेल के परिचालन से अब कोरोना की पहुँच हर गाँव तक हो चुकी है. इसलिए हमें  सतर्कत तो रहना ही होगा. 

हमारी आपकी लापरवाही से कोरोना आ असली खेल शुरू होगा. लापरवाही से आप अपनी ही नहीं अपने परिजनों की जान जोखिम में डाल देंगे.

Friday, May 22, 2020

बहुत कठिन है डगर हर्ड इम्यूनिटी की



जहाँ तक मुझे समझ आ रहा है कोविड - 19 वाइरस इतना आसान भी नहीं है, जितना इसे देश में सरकार के साथ-साथ लोग समझ रहे हैं और समझाने में लगे हैं. कोरोना संक्रमण अभी अपने शुरूआती दौड़ में ही है और इसे सामान्य समझ कर बिना जरूरत के खतरे लेने के कारण गंभीर परिणाम आ सकते हैं. बुरा दौर तब शुरू होगा, जब स्थिति को सामान्य करने और समझने के कारण लोग विस्फोटक रूप से संक्रमित होंगे. लोगों को इसके खतरे को समझना चाहिए. हमें आगे भी सावधान रहने की जरूरत है.

कोई कुछ नहीं जनता

एक बात याद रखिये, इस विचित्र कोविड-19 के बारे में WHO, दुनिया भर के देशों की सरकार और हमारे वैज्ञानिक, डॉक्टर हमें और आपको विश्वास दिला रही है कि वो सबकुछ जानते हैं. 
पर सच तो ये हैं कि कोई कुछ नहीं जनता और सब अँधेरे में तीर चला रहे हैं. हालात जब बेकाबू हो रहे हैं तो सरकार, वैज्ञानिक और डॉक्टर हर्ड इम्यूनिटी की बात कर रहे हैं. 
माना जा रहा है की जब अधिकतर लोग इन्फेक्टेड हो जायेंगे तो धीरे-धीरे हमारा शरीर इनके खिलाफ रोग प्रतिरोधक क्षमता बना लेगा, इसे ही हर्ड इम्यूनिटी कहा जा रहा है. कुछ मित्रों को मेरी बात अगर याद होगी, मैंने ये बात काफी पहले ही कहा था कि लॉक डाउन हटने के बाद, जीवन सामान्य होने पर हममें से 60% – 70% लोग संक्रमित होंगे. पर क्या ये सब बिना खतरे के हो जाएगा? क्या हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने में किसी की जान नहीं जाएगी?


हर्ड इम्यूनिटी कोई भ्रम तो नहीं  

इस प्रश्न के जवाब में मैं बस इतना कहना चाहूँगा, अभी तक के ट्रेंड को देखिये. एक ही परिवार के एक सदस्य की मौत हो जाती है, जबकि दुसरे को यह पता भी नहीं चलता कि वो भी संक्रमित है. इस हिसाब से भी हर्ड इम्यूनिटी बनने के क्रम में कोविड- 19 भीषण ताण्डव मचा सकता है. अगर हर्ड इम्यूनिटी जैसी कोई चीज होती तो फिर वुहान में चीन इतना परेशान क्यों है? क्यों वुहान में लाखों लोगों का टेस्ट किया जा रहा है? चीन के वुहान को तो सबसे पहले हर्ड इम्यूनिटी हासिल कर लेना चाहिए और उसे बिल्कुल निश्चिंत हो जाना चाहिए था. कोरोना की वापसी की खबर के बीच क्यों वहाँ लाखों लोगों के टेस्ट किए जा रहे हैं. आप भी सोचिये आखिर क्यों ? 

कामकाज को पटरी पर लाना ही होगा

आज न कल लॉक डाउन को हटना ही था और हटेंगे भी. सरकार धीरे-धीरे नहीं सुपरसोनिक स्पीड में सबकुछ सामान्य करने की कोशिश करेगी. आखिर देश को बंद भी कितने दिन रखा जा सकता है. पर स्थिति को सामान्य समझने की भूल भारी पड़ सकती है. इसलिए तमाम सुरक्षा उपायों और सावधानियों के साथ कामकाज पर लौटिये. मुंह पर मास्क के साथ हैंड सैनिटाइजर तो सदा आपके पॉकेट में होना ही चाहिए. साथ ही एक बैग या थैला भी अब आपके पास हमेशा होना चाहिए. जिसमें साबुन, हैंड टॉवल, नैपकिन के साथ आपकी पानी की बोतल भी हो. 


भूलकर भी गलती ना करें 

कामकाज के अतिरिक्त घरों से तभी निकले जब अति आवश्यक हो. जरुरत के सामान महीने के हिसाब से और फल-सब्जियां हफ्ते में एक बार लाने का नियम बना लें, यही आपके साथ आपके संपर्क में आने वाले हर किसी के लिए भला होगा. जिसमें आपका परिवार सबसे पहले आता है. किसी की इस्तेमाल की गई किसी चीज को इस्तेमाल ना करें और ना ही समाजसेवक बने और अपनी चीजें दूसरों को इस्तेमाल के लिए दें. साथ ही बाहर मौज-मस्ती पर जाने, माल, सिनेमा, थिएटर, भीड़भाड़ वाले जगहों जाने पर लगाम लगाए. कोविड- 19 को हमारे देश में अभी संभाला नहीं जा सका है. यह अपना रूप-रंग हर देश में बदल रहा है. हवाई और रेल सेवा बहाल होने के बाद, यह किस रूप में वापसी करेगा ये अभी सोचा भी नहीं जा सकता. किसी वैक्सीन के जल्द आने की उम्मीद भी ना पालें.

बहुत कठिन है डगर हर्ड इम्यूनिटी की, जिसमें बचाव ही एक मात्र उपाय है.  सुरक्षित रहिये और जोश में होश ना गवाएं.

Tuesday, May 12, 2020

कोरोना कुछ सकारात्मक भी सीखा रहा

Say Yes to घर का खाना (Home Made Foods)

कुछ मित्रों से बात हुई. लोग कई तरह के परेशानियों का सामना कर रहे हैं और हर कोई अपने को जैसे-तैसे एडजस्ट कर इस महामारी के दौड़ के बीत जाने की प्रार्थना कर रहा है. परेशानियों की अगर लिस्ट बनाई जाएँ तो कई लोगों की लिस्ट रामायण से भी मोटी हो सकती है. मेरे जैसे कुछ लोग ही सही, पर होंगे जरुर, जिन्हें विरासत में "सदा जीवन उच्च विचार" की थाती मिली हो. ऐसे परिवार में किसी भी सदस्य को इस बुरे दौड़ में कुछ भी असहज नहीं लग रहा. बच्चों के स्कूल बंद होने के अलावा, सबकुछ सामान्य है, जीवन एकदम शांत और सहज है. 

इस माहामारी ने "सादा जीवन" का मंत्र से सबको अवगत करा दिया है, हम बिना शौपिंग के, बिना सिनेमाघरों के भी जी सकते हैं. हम बिना आउटिंग और होटलबाजी के भी जी सकते हैं. हम बिना पिज्जा-बर्गर के भी जी सकते हैं. हम बेमतलब दिनभर बाहर समय व्यतित किये बिना भी जी सकते हैं. मतलब इस माहामारी के दौड़ में प्रकृति के द्वारा दी जाने वाली चेतावनी और सीख के साथ आगे जिन्दगी जिए तो शायद हमारा जीवन थोडा सरल और पर्यावरण के अनुकूल हो. 

इस माहामारी ने हमें सिखाया कैसे बाजार पर निर्भरता कम कर भी लोग मजे से जी सकते हैं. घरों में बंद लोग तरह - तरह के पकवानों को आजमा रहे हैं, अपने घर की साफ सफाई खुद कर रहे हैं. मिठाइयों के लिए हलवाइयों पर निर्भर रहने के बजाए लोग कुछ ना कुछ खुद बनाने की कोशश कर रहे हैं और ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने इस महामारी के पहले ऐसा कभी नहीं किया था. इसी सोच को लॉक डाउन ख़त्म होने के बाद भी आगे जिन्दा रखने की जरूरत है. बाहर के खानपान पर निर्भरता कम कीजिये, घरों में शुद्द, स्वच्छ और सेहत के लिय वरदान साबित होने वाला जो नुस्खा इस कोरोना की वजह से मिला है, इसे जीवन में आत्मसाद कीजिये.  

बाजारवाद पर हमें जीत हासिल करनी होगी, कुछ हद तक ही सही. ज्यादा से ज्यादा खानपान होममेड करने की कोशिश कीजिए, चाहे वो कोई भी पकवान हो या मिठाई. हमारे घरों में ये एक परंपरा ही है. माताजी के बाद  श्रीमतीजी ने भी इस परंपरा को खूब निभाना सीख लिया है और आप भी अपने घरों में आजमाकर देखिये. ये थोडा मुश्किल हो सकता है, नामुम्किल बिलकुल नहीं.

Saturday, May 9, 2020

सरकार एक मदारी, कोरोना जमूरा और हम और आप दर्शक -2




जैसा कि कल बताया था, दो घटनाओं के बारे में. दोनों घटनाओं से आपको एक-एक कर अवगत करवाऊंगा कहा था. पर कल एक घटना ही आपके सामने रख पाया, जिसे आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं - https://nakkarkhaanaa.blogspot.com/2020/05/blog-post.html, तो आज बात दूसरी घटना की. लोग घरों में बंद हैं, मज़बूरी भी है. इधर दिन रात लगातार आपको कोरोना का समाचार मिल रहा है और सरकार के समर्थक वाह - वाह करते नहीं थक रहे कि सरकार बेहतरीन काम कर रही है. सरकार तो सरकार है जी,  जिस तरह बाकि चीजों में आज तक सीरियस रही है वैसे भी कोरोना से लड़ने में सच में सिरियस है. इसमें आप और हम दोष देंगे सेवा देने वाले को जो आपको सामने दिखेगा... डॉक्टर, नर्स, मेडिकल स्टाफ, पुलिसकर्मी. ये लोग आपको सामने दिख रहे तो कुछ लोग इनके काम की सराहना भी कर रहे हैं और करना भी चाहिए.

पर असल समस्या ये सेवा देने वाले नहीं है, जिसपर आप और हम लापरवाही का सारा दोष लगाते हैं. समस्या है सिस्टम में और वो भी ऊपर से.

दूसरी घटना
जैसा कि कहा जा रहा है बाहर से आने वाले को 14 दिनों तक अलग रखा जायेगा, मतलब कोरोंनटाईन किया जायेगा. ये भारत सरकार का आदेश है जिसे हर राज्य को मानना है. जैसा कि आपलोगों को भी जानकारी में होगा कि कोटा से छात्रों और छात्राओं को लेकर रेलवे की श्रमिक गाड़ी दानापुर 2 मई, 2020 को पहुंची. सभी यात्रियों की पूरी तामझाम के साथ स्वागत किया गया. ट्रेन से उतरते के बाद सेनेटाईज कर स्क्रीनिंग की गई. सबकुछ पुरे कड़ाई से किया गया. इसके लिए आपके साथ मैं भी ताली बजाने को तैयार हूँ. अच्छे काम की तारीफ तो करनी ही चाहिए.

अब आप सोच रहे होंगे क़ी राजस्थान से आने वालों 1200 यात्रियों को तो सरकार पूरी कड़ाई से कोरोंनटाईन सेण्टर ले जाकर रखेगी. होना भी यही चाहिए था. पर हुआ कुछ और. 

क्या हुआ मालूम है आपको? शायद नहीं.
सरकार ने सारे  छात्रों और छात्राओं को सिर्फ स्क्रीनिंग कर सबको अपने - अपने जिले भेज दिया और सभी  छात्रों और छात्राओं को अपने जिले पहुँचने के बाद अपने - अपने घर भेज दिया गया. हमारे आसपास के घरों में ही दर्जनों  छात्र-छात्राएं अपने घर को लौट आए और खुश हैं कि वो अपने घर पहुँच गए.

अब आप इस घटना से अंदाजा लगा लीजिए किस तरह का संकट बाहर से आने वाले श्रमिक आयर  छात्र-छात्राएं लेकर आपके और हमारे आसपास पहुँच चुके हैं. और मुझे पूरी उम्मीद है श्रमिक गाड़ियों से आने वालों लाखों लोगों का भी हाल यही होगा. आने वाले दिनों में श्रमिक गाड़ियों से मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, उड़ीसा को सिर्फ और सिर्फ सर दर्द मिलने वाला है, अगर आने वालों के साथ बिहार सरकार की तरह ही लापरवाही हर जगह की जा रही होगी.

अब आप ही सोचिये क्या मैंने सच नहीं कहा कि कोरोना के नाम पर सिर्फ नौटंकी चल रही है, जिसमें सरकार एक मदारी, कोरोना जमूरा और हम और आप दर्शक मात्र हैं.

Friday, May 8, 2020

सरकार एक मदारी, कोरोना जमूरा और हम और आप दर्शक

कल दो घटनाएँ हुई. दोनों घटनाओं से आपको एक-एक कर अवगत करवाऊंगा. दृष्टांत थोड़ी लम्बी हैं पर ध्यान से पढ़िए. जिनको भी लगता है सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है वो लोग डॉक्टरों, नर्सों, हॉस्पिटल में तैनात स्टाफ, पुलिसकर्मी, सीआईएसफ, सीआरपीफ और सेना के जवानों के मरने की खबर की बिहाइंड द न्यूज़ को समझने का प्रयास कीजिये. और ऐसी हजारों लोगों की मौत से ना सिर्फ आप बल्कि सरकार तक भी अनजान हैं अभी. और इसका सिर्फ और सिर्फ एक कारण है सुरक्षा के बिना किसी उपायों के ये लोग काम कर रहे हैं. ये मामला ठीक वैसे ही है जिसे किसी युद्ध में सेना को उतार तो दिया जाये, पर उसके पास लड़ने को बंदूकें और तोपें ना हों.
पहली घटना पहली घटना ये कि हैदराबाद से 1200 लोगों को लेकर एक श्रमिक गाड़ी नाम की ट्रेन डायरेक्ट भागलपुर आई, जिसमें खगड़िया, बेगुसराय, पूर्णियां, कटिहार, मुंगेर, मधेपुरा और ना जाने कहाँ कहाँ के लोग, जो निसंदेश पीड़ित थे, अपनी धरती को दुबारा देखने और जमीन को छूने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. स्टेशन पर सुबह से 7 बजे से कड़ी व्यवस्था थी. बिलकुल कड़ी ... एक परिंदा भी बिना आदेश फरफरा नहीं सकता था. डॉक्टर्स की टीम, सेनेटाईजर वाहन, बसों की लम्बी कतार जिसमें मैंने सुबह ही 8 बजे तक 36 बसों को स्टेशन के बाहर खड़े देखा था. सबकुछ हो रहा था जो होना चाहिए... और साथ में हो रहा था समाचार का लाइव कवरेज. आखिर मिडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है तो वो कैसे पीछे रहते. खचाखच फोटोग्राफी, समाचारों का प्रसारण. गाड़ी सुबह 8:10 बजे आने के कई घटे विलम्ब से दोपहर के 1:40 पर आई. ट्रेन से सारे दरवाजों को बंद करवा दिया गया और एक-एक पसेंजर को उतारा गया और स्क्रीनिंग (जिसका मैं सदा से नौटंकी कहता आया हूँ, किया गया) करके एक - एक पैसेंजर को सेनेटाईज कर, एक पानी की बोतल और एक खाने का पैकेट सम्मान के साथ देकर, सबके लिए जिले अनुसार निर्धारित बसों में भेज दिया गया. यहाँ तक मिडिया पल पल की खबर ले और दे रही थी. अब आते हैं असल मुद्दे पर. यहाँ तक तो जो हुआ उसे देखकर आप सरकार की जयकारे लगाने लगेंगे. पर असली खेल बिहाइंड द कैमरा शुरू हुआ. बसों में जरूरत से ज्यादा लोगों को भर दिया गया, जिससे सोशल डिस्टेंस भागलपुर स्टेशन पर ही तेल लेने चली गई. और उसके बाद इसमें से कितने लोग कोरोंटाईन शिविर में रहेंगे ये ना आप जान पाएंगे और ना मैं. जब हॉस्पिटल से संदिग्ध पोजेटिव केस वाले लोग भाग जा रहे हैं, तो क्या गाँव के लोग जिनके सर पर इन बाहर से आने वालों का बोझ दे दिया, जिसमें 20% लोग जरुर संक्रमित होंगे. क्या संभाल पाएंगे उनको ? जरा सोचिये. बस को उनके गाँव तक पहुंचा कर सरकार का दायित्व ख़त्म. उसके बाद गाँव वाले जाने. बात यही ख़त्म नहीं हुई, अब सरकार तो बड़े बैंड बाजे के साथ आपको बता रही है की ट्रेन को सेनेटाईज किया जा रहा है. ऐसी किसी भी ट्रेन को एक इस्तेमाल के बाद कम से कम 7 दिनों के लिए ह्यूमन टच से दूर रखना था. पर हुआ ये कि 24 डब्बे के ट्रेन को आधे घंटे से भी कम समय में सिर्फ एक कृषि कार्यों में उपयोग होने वाले पंप से सेनेटाईज घोषित कर दिया गया. और उसे मेंटेनेस के लिए भेज दिया गया. जहाँ उसे सरकार के तानाशास अफसरों के आदेश को मानते हुए सरकारी गुलामों ने मेकनिकल और इलेक्ट्रिक वर्क का काम किया और करवाया. वो भी बिना किसी सुरक्षा उपायों के. ये है अलसी बिहाइड द सीन सरकारी काम. जिससे कारण कोरोना के संक्रमण पर लगाम नहीं लग रहा है. सबकुछ बड़े तामझाम से होता है, पर जो होना चाहिए वही नहीं होता. जरा सोचिये, एक अटैच बाथरूम वाले कमरे को लाइजोल, साबुन और फिनाइल मिक्स कर फ्लोर, खिड़की और दरवाजों के साथ बाथरूम के दीवारों तक को साफ करने में 40 दिनों तक मैंने हर दिन 30 मिनट से ही अधिक समय लगया था. पर इससे भी कम समय में मात्र एक बन्दे ने 24 डब्बों को सेनेटाईज कर दिया. बाकि उस मशीन में पानी से साथ सिर्फ पानी था या कुछ और इसमें भी मुझे संशय है.

Sunday, March 15, 2020

लेटेस्ट महामारी कोरोना के फैलने का कारण



अगर गौर करेंगे तो पायेंगे पिछले कुछ सालों से हर साल इस मौसम में एक नई बीमारी पैदा हो जाती है. कभी वर्ड फ्लू, कभी चिकनगुनियाँ, कभी कोरोना..... और ऐसा अब आगे भी चलता रहेगा.

अगर ध्यान दिया जाए तो आपको पता चलेगा कि सारे के सारे लेटेस्ट बीमारी जो महामारी बनकर फ़ैल रही है साल दर साल, वो फ़ैल रही है मांसाहार की वजह से. जिसका परिणाम भुगतना सबको पड़ता है चाहे वो शाकाहार्री हो या मांसाहारी.

सन्देश बिलकुल साफ आ रहा है, शाकाहार अपनाओ.
पर इसे न कोई समझना चाहता है और ना किसी को समझ ही आ रहा है. सरकार और वैज्ञानिक चाहे जितना चिल्ला ले, मांस और मुर्गे से ये कोरोना नहीं फैलती. पर अपनी मोटी बुद्दी लगाओ और इसकी उत्पत्ति के कारण को देखो, सोचो.

प्रकृति का सन्देश बिलकुल साफ है, अपना इयरफोन ठीक करो ताकि सन्देश भेजे तक जाएँ. जिसे मेरे कहे पर भरोसा नहीं जाओ मार्किट और चालीस रूपये किलो मुर्गा बिक रहा, ले आओ और मौज करो. 

ऐसा मौका फिर ना मिलने का.

जय श्रीराम 

Tuesday, February 18, 2020

मशिनियुग के मानव का जन्म

फेसबुक पर 12 साल हो गए.
इसके पहले ऑरकुट को भी इस्तेमाल कर चूका कई सालों तक. उस ज़माने में एक ग्रुप मैंने भी शुरू किया था जो दिल्ली एनसीआर बेस्ड था और उसपर 5000 लोग खुद जुड़े थे. ऑरकुट ने बाद में दम तोड़ दिया.
खैर, 12 साल बीत जाने के बाद भी मित्र की संख्या 1200 तक भी नहीं पहुँची, और हर साल और दो साल में छटनी कार्यक्रम भी करता रहता हूँ, जिसमें स्लीपर्स सेल को बाहर करता रहता हूँ. पिछले साल ही 500 लोगों को इसलिय unfriend किया क्योकिं उनके जिन्दा होने का कोई प्रमाण उनके अपने प्रोफाइल पर भी नहीं मिल रहा था. इसमें कई नजदीकी लोग और कई योगी-योगिनी भी थी. शायद समाधी मिल गई हो उन्हें.
मेरा इन्टरनेट से परिचय 1998 - 1999 में ही हो गया, मतलब 22 साल से ज्यादा हो गए मायाजाल पर. 12 साल का लम्बा सफ़र रहा फेसबुक पर. कई लोगों को मानसिक रोग से ग्रस्त होते और कई लोगों को मानसिक संतुलन खोते भी देख रहा हूँ. मतलब फेसबुक आपको कण्ट्रोल करने लगा है. पर मैंने ऐसी नौबत न आने दी कभी अपने जीवन में. और इसके लिए महीनों तक इससे दूर रहने का अभ्यास भी करता रहा. Whatsapp का शुरूआती इस्तेमालकर्ता रहा, पर जब लगातार - बारबार आती फालतू के सन्देश और दिन रात बेमतलब के विडिओ मानसिक शान्ति भंग करने लगे तो सालों तक अपने अकाउंट को डिलीट कर भी जिया और वो भी असीम शान्ति से.
आजकल फेसबुक फास्टिंग मोड़ में हूँ और दिन में एक आध बार दस मिनट के लिय ही इधर झांक रहा हूँ और किसी दिन वो भी नहीं. कहने का मतलब ये है की टेक्नोलोजी अपनी सुविधा और क्रिएटिविटी के लिए इस्तेमाल करिए ना कि अपने आपको उसके हवाले कर दीजिये. किसी की कमेंट और लाइक जब आपके मूड को दिशा देने लगे तो समझ लीजिये आप फेसबुक के गुलाम हो चुके हैं और मशिनियुग का मानव आपके अन्दर जन्म ले चूका है.

आपकी रामप्यारी चाय.... चाय...


आओ आज आपको एक गूढ़ ज्ञान दूँ...


सारे चाय पीने वाले कृप्या ज्ञानवाणी पर ध्यान दें, जे आपके लिए ही है. और हाँ मैं यहाँ आपको चाय छोड़ने नहीं बोलने वाला, आप निश्चित रहे. 😂
पिछली बार आपको बताया था ट्रेन के बिरयानी और अंडा बिरयानी का राज और आज बारी है आपकी रामप्यारी
चाय.... चाय...
(बिरियानी का फंडा का लिंक
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10156733265908231&id=565053230)
आपकी प्यारी इसलिए बोला, मुझे इससे उतनी ही नफरत है जितनी शराब... बोले तो दारू से. 😝
नफरत इसलिए, क्योंकि है तो यह किसी काम का नहीं, उल्टा हजार बीमारियों की दुकान बना जाती आपके शरीर को.
खैर, मुझे इससे क्या.
आप पियो... आप मरो...
डॉक्टर को पैसे देते रहो... गैस.... एसिडिटी... हाइपरटेंशन... कब्ज... अल्सर... पाइल्स को बढ़ाते रहो....
चाय... चाय.... 😂
खैर मुद्दा जे भी ना है. 😜
असली बात जो आपको बताने वाला हूँ, वो है.... ट्रेन में आप जो चाय पीते हैं, बनती कैसे है? देखा है क्या किसी ने बनती हुई अपनी रामप्यारी को?
नहीं देखा तो चलो मैं दिखाता हूँ....
चाय वाले serving pot को नल 🚰 के नीचे लगाकर उसे भर लिया जाता है, थोड़ा खाली रखा जाता है ताकि दूध के लिए थोड़ी गुंजाईश रहे. अब इसे उठाकर सीधा लगा दिया जाता है गर्म होने. पता है गर्म कैसे करेंगे... अरे वो घरों में पानी गर्म करने के लिए रॉड आता है न बस उसे घुसेडे देते है और स्विच ऑन कर दिया हो गया. पानी गर्म होने पर उसमें चाय पत्ती को एक पोटली में बाँधकर डुबो देते हैं. हाँ जे कपड़ा हो सकता है उसके पहले साफ सफाई में इस्तेमाल हुआ हो 😜😂 थोड़ी देर के बाद दुध को पैकेट से सीधे गर्म होते serving pot में डाल दिया जाता है. अब जे मत समझ लेना कि 10 लीटर में 5 लीटर दुध दिया जा रहा. 😜 इसके साथ ही चीनी डाला दिया जाता है और किसी, यहाँ वहाँ पड़े डंडे से उसे मिला दिया जाता है और बन गया आपकी रामप्यारी चाय. यही serving pot लेकर दिन रात चाय वाला आपकी कान खाए रहता है हर डब्बे में. और आप पीते भी बड़े चाव और शान से हो 10 और 20 रुपये देकर. पियो पियो... मजे करो.
सुबह का बना चाय सुबह को खत्म न हुआ तो उसे फिर से एक बार गर्म कर दिया और फिर शुरू हो गया चाय.... चाय... 😝
अब चाय वाले की किस्मत खराब हो या मेरे जैसे मिल जाएं या फिर कुछ लोग घर से हॉट बोतल में लेकर भी चलते हैं और चाय न बिकी तो फिर वही चाय आप शाम और रात को सोते सोते भी यह कहते पीते हो कि मुझे तो सोने के पहले चाय न मिले तो नींद नहीं आती. बढ़िया है जी पियो... चाय.... चाय...
आपलोगों के लिए ही ठेकेदार आईआरसीटीसी को करोड़ों दे रहा पेंट्रीकार के ठेके का, आखिर उसके बीबी बच्चे कहाँ जाएंगे. आप न खाओगे बिरयानी और अंडा बिरयानी और न पियोगे चाय, तो उस बेचारे के बीबी बच्चे तो भूखे मर जायेंगे. समाजवाद अपनाओ... अपने को मारकर भी दूसरे के घर में चूल्हा जलाओ. 😂 😜
और हाँ, अगली बार से कोशिश करना कम से कम पाँच - सात कप चाय तो निपटा ही देना और नहीं तो क्या. 😂 और हाँ रेलवे के पेटेंट बिरियानी और अंडा बिरयानी भी जम के खाओ, भले घर से लाया आपका खाना बासी हो गया हो और फेंकने लायक हो. पर पेंट्रीकार का एक दिन पहले के चावल से बना अंडा 🥚 बिरियानी कभी बासी नहीं होता. आप आराम और शान से खाओ. 😂
आज के लिए इतना ज्ञान ही काफी है, नहीं तो दस्त हो जायेगा. 😂
हाँ, बात समझ आ जाए तो शेयर करते जाना, ताकि और तक बात पहुंचे.

Wednesday, November 20, 2019

I'm jack-of-all-trades, master of none

पिछले कुछ दिनों में, मेरे मित्रों ने मुझे कुछ सलाह दी. मित्रों की सलाह देखिये - पहला मित्र योग से जुड़ा है - "ये आजकल क्या करते रहते हो, कभी नैनीताल, कभी भीमताल, कभी मेघालय, कभी सिक्किम. भाई योग की बात करो, हम सिर्फ योग को फॉलो करते हैं.... गुरु जी की बात करो." मैं हाथ जोड़कर - अब ऐसा ही करूँगा गुरुभाई. दूसरा मित्र मेरे पर्सनल फाइनेंस के जानकारी की वजह से जुड़ा था मुझसे - "अबे ये क्या करता रहता है, फाइनेंस तो नजर ही नहीं आ रहा है तुम्हारी पोस्ट में. कुछ insurance ही बिकवा दो, तेरा भी फायदा होगा." मैं हाथ जोड़कर - ठीक है अब से insurance ही बेचूंगा. तीसरा मित्र काफी पुरानी जान पहचान है- "ये क्या करते रहते हो? कभी योग, कभी ट्रेवल, कभी कविता, कभी पर्सनल फाइनेंस, कभी राइटिंग, कभी फोटोग्राफी, तो कभी बागवानी, कभी नेचर तो कभी कुकिंग. यार इतना समय और जानकारी कहाँ से लाता है. मुझे समझ ही नहीं आता तू क्या है." मैं - फिर क्या करूँ ? "यार एक ही फील्ड पर टिके रहो, ये रेलवे के ट्रेन की तरह ट्रेक मत बदलते रहो." मैं हाथ जोड़कर - ठीक है मैं बस अपनी नौकरी के अलावा कुछ नहीं सोचूंगा अब आगे से. चौथा मित्र, जो मेरे कई सारे ट्रेवल देखकर जलाभुना जा रहा है- "क्या है ये www.yayavarektraveler.com? उसकी बात करो जिससे कुछ समाज का भला हो. जब देखो घुमने-फिरने की बात करते रहते हो. पैसे खर्च होते हैं घुमने में भाई, वो कौन देगा?" मैं हाथ जोड़कर - भाई ऐसा है तुम मरो अपने पैसे के साथ, मुझे जो अच्छा लगता है करता हूँ. वैसे एक बात बताओ, ये मेरे घुमने, मेरे वेबसाइट और मेरे घर को चलाने को तुम डोनेसन देते हो क्या मुझे? चौथा मित्र तिलमिला उठा- "यार, तेरी ऐसी पोस्ट देखकर पेट में बहुत भारी गैस बन जाती है मुझे, कलेजा जलने लगता है." ये सब एक सप्ताह में घटित घटनाक्रम पर आधारित है. मैं अपने जवाब में अंग्रेजी की एक phrases कहना चाहता हूँ - “I'm jack-of-all-trades, master of none” मुझे अपनी जिन्दगी जीनी है, अपने सपनों के साथ मरना नहीं जीना चाहता हूँ, तो जो अच्छा लगता है करता हूँ. और मेरे भाई नीली छतरी वाले ने ही मुझे Multi Skilled बनाया तो इसमें मेरा क्या दोष.

Sunday, September 22, 2019

यात्रा में बोतल न खरीदने का यह उपाय

जब Eureka Aquaguard Personal Water Purifier Bottle  खरीदी थी तो एक पोस्ट लिखी थी. कहा था, इस्तेमाल के बाद इसका रीव्यू भी दूँगा.
आठ दिन की आसाम और मेघालय यात्रा में Eureka Aquaguard Personal Water Purifier Bottle  का जमकर इस्तेमाल किया और पूरी यात्रा में मैंने पैक्ड बोतल का पानी खरीदकर नहीं पिया. होटल और गेस्ट हाउस में जो RO लगे थे उससे इसमें पानी भरा. बाहर घूमने निकालने पर जहाँ भी पानी मिला इसमें भरता रहा और पीता रहा. कभी चलते नल से पानी भरा, तो कभी झरने से.
बाकि लोग जब पानी के लिये बेहाल हो रहे थे, अपन बिंदास कोई भी चलता फिरता साफ पानी देख बोतल भर लेता था पीता रहता था. इस बोतल को टेस्ट भी तो करना था. चेरापूंजी और दाऊकी की यात्रा के साथ डबल डेकर लिविंग रूट ब्रिज की ट्रेक पर भी बहते झरने का पानी बिंदास भरा और मस्त होकर और पीता रहा. वैसे तो डबल डेकर लिविंग रूट ब्रिज के ट्रेक पर सीधे गिरते झरने का पानी भी पीया और सच मानिये, जब घर लौटकर आया तो घर के RO का पानी बिल्कुल खारा लग रहा था.
मेरा एक ही उद्देश्य रहा इस यात्रा में पानी के लिये "Say No To Bottle Water". और खुशी की बात यह भी रही कहीं कोई दिक्कत नहीं हुई, कहीं पेट गडबड नहीं हुई और न ही पानी कम पीने की कोई परेशानी रही.
इस बोतल की वजह से आठ दिन में कम से कम 24 -25 लीटर बोतल का पानी पी ही जाना था और 20 से 25 रुपये के हिसाब से 500 से 625 रूपये तो बचे ही. मेघालय जैसी खूबसूरत पहाड़ी क्षेत्र और वहाँ के जंगल को भी प्लास्टिक कचरे के जहर से बचाया. मतलब इस बोतल पर खर्च किये गए रूपये तो एक यात्रा में ही समझ लो निकल गए. बोतल को साफ कर सुखा कर रख दिया गया है, अगली यात्रा पर फिर से निकाला जाएगा.

Friday, August 30, 2019

बिन पानी सब सून


एक नए किस्म का झोल है आजकल यात्रा में और वो है - पानी.

 
मुंगेर कष्टहरनी घाट से मुंगेर गंगा पर बने रेल सह सड़क पुल का नजारा   
पहले जब ट्रेन सफर होता था या नानी घर का ही सफर होता था तो हम स्टेशन, बस स्टैंड पर बहते नल या फिर चापनल (Hand Pump) का पानी पी लेते थे और और आत्मा तृप्त हो जाती थी ठन्डे-मीठे पानी से, सच में. मुंगेर घाट से गंगाजी को जहाज से पार कर जाते थे, इस पार या उस पार घुग्नी-मुढ़ी के दुकानों की रौनक होती थी और हमें भी नानाजी या मामाजी खिलाते थे. पत्ते में मुढ़ी के ऊपर बिल्कुल गाढ़ी बेसन की ग्रेवी वाली घुग्नी और उसके ऊपर गर्मागर्म पकौड़े, जिसे यहाँ प्याजू भी बोलते हैं और ऊपर से हरी मिर्च और कटी प्याज. इतने से भी मन न भरता तो फिर से गर्मागर्म पकौड़े, आलू चोप और कभी-कभी लिट्टी-घुग्नी का भी दौड़ चलता, जब तक जहाज जाने के लिये तैयार न हो जाता खाते ही जाते. और खाने-पीने के बाद पानी तो चाहिए ही क्योंकि आँखों में आंसू भर जाते थे मिर्ची से और मिर्ची खाने की आदत थी न हमारी. तो घाट पर पानी मतलब - गंगा का बहता निर्मल पानी. प्यास बुझाने का एक मात्र यही साधन होता था. हम भाई बहन थे थोड़े चिकनफट, मतलब साफ-सुथरे रहने वाले और गंदे लोगों को तो देखते भी न थे. पास बैठने की नौवत आती तो खड़े ही सफर करना मंजूर होता था. ये सब बचपन की बात बता रहा हूँ. 

तो बाल्टी में गन्दा पानी बालू मिला देखकर भाई-बहन माँ की ओर देखते और माँ तो माँ होती है समझ जाती थी हमारी पीड़ा. फिर प्यार से पुचकारती और कहती थोड़ा पी लो, सब यहाँ यही पीते हैं. अब जब मिर्ची लगी हो और दोनों कानों से, नाक से धुआं निकल रहा हो और दोनों आखें आग की भट्टी ही जल रही हो तो फिर तोडा और ज्यादा क्या. दमभर पीते थे, और हाँ बीमार भी नहीं पड़ते थे, भले पानी कितना भी गन्दा दिखता हो.

पर अब वो हालत नहीं, हमने जमीन के अंदर के पानी को अपने ही  हाथों जहरीला बना डाला और अब यात्रा में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति कम से कम तीन लीटर बोतल बंद पानी खरीदते ही हैं, जो प्लास्टिक की बोतलों में बंद होता है. सच कहूँ, ये बोतलबंद पानी जिसे आप बड़े शान से खरीदकर पी रहे हैं, ज्यादातर पीने लायक ही नहीं है. अब पानी का स्टैण्डर्ड क्या है, नहीं है वो मामला छोड़ भी दें और ये मान ले कि सभी उच्च स्तरों के हैं तो भी ये बोतलें कहाँ - कहाँ पड़ी और पटकी गई, वो जगहें क्या हैजेनिक थी? कुत्ते इन बोतलों पर चढ़कर कई बार मूत चुके होते हैं, जिसमें हम और आप मुहँ लगाकर पीते हैं. पानी की बोतले खुली जगहों पर कई दिनों तक डायरेक्ट तेज धुप में पड़ी रहती हैं, जहाँ बोतल के प्लास्टिक के साथ पानी का क्या रिएक्शन हुआ? ये तो कोई विज्ञानी ही बता पायेगा, पर मुझे जहाँ तक समझ आता है जाहिर है ये प्लास्टिक गुलाबजल या शरबत तो न ही घोल रहा होगा पानी में. तो पैसे देकर शान से जहर ही ले रहे हैं, और प्रदुषण अलग फैला रहे हैं. जिसका परिणाम हमारे ही विनाश से होना है, जाहिर सी बात है.

तो समाधान क्या है?


पिछले कई यात्राओं से हमने बोतल बंद पानी लेना लगभग छोड़ दिया है. इस वर्ष जिंतनी भी यात्रायें हुई परिवार के साथ सबमें हमने घर से पानी ढोया, होटल के RO का पानी पिया, (वैसे RO भी मेरे लिये संदेह के घेरे में ही है). जिधर भी निकलना हुआ हमने एक-दो लीटर पानी बैग में रखा और उसे ही इस्तेमाल किया. यहाँ तक की नन्हें बच्चों के बैग में भी छोटी बोतल में पानी भर कर उसके कंधे पर टांग दिया, ताकी अपने हिस्से का पानी वो खुद ढोए. जहां कहीं भी RO या फिल्टर नजर आया उससे बोतल को फिर से भरा. मतलब पानी के खाली बोतल को जिसे आप एक बार पीकर शान से स्टेशन और सड़क पर उछाल देते हो न, उस बोतल की जान निकाल दी हमने भर-भर कर. हाँ आपकी तक स्टेशन और सड़क पर उसे उछालने का मजा न मिला मुझे, यही मिस किया. और मिस किया प्रदुषण फ़ैलाने में अपना योगदान. वैसे तो देखा जाये तो हम मानव भस्मासुर के खानदानी हैं, अब वो किससे रिश्ते में फूफा लगता और किसके रिश्ते में ताऊ ये तो पता नहीं, पर हैं सबके सब भस्मासुर की औलादें इसमें कोई दो राय हो ही नहीं सकती. खुद का नाश करने के लिये नित नए खोज करते रहते हैं.

Eureka Aquaguard Personal Water Purifier


खैर, इतना लेक्चर देने का कारण जे है कि हमने बोतल तो लेना छोड़ ही दिया और पानी ढोनेवाला काम करने लगे. कई साल पहले एक ट्रेकर मित्र जो आउटलुक ग्रुप में एक मैग्जीन के सब एडिटर हैं के पोस्ट पर एक बोतल देखी थी. जब वो किसी ट्रेक पर निकल रहे थे और उन्होंने बताया था कि इस बोतल में तालाब, झील, झरने का पानी भर कर भी पी सकते हैं. फिर पिछले साल ही एक और ट्रेकर मित्र ने इस बोतल के बारे में लिखा तो इसे लेने की इच्छा हुई और कुछ दिनों पहले ऑनलाइन Eureka Aquaguard Personal Water Purifier Bottle आर्डर किया, जो कल ही मिला है. जिसमें फ़िल्टर लगा हुआ है और कम्पनी दावा करती है कि सोलिड पार्टिकल्स के साथ साथ 99.9% कीटाणुओं से रहित पानी फिल्टर करके देगा. ये गंदे पानी को भी साफ कर पीने लायक बनाने का दावा करता है, अब इसका टेस्ट तो यात्रा में ही होना है.

वैसे तो हमारा परिवार पंच-प्यारे का है और सबके सब घुमक्कड़ है. आज तक मेरी शायद ही कोई आउटिंग परिवार के बिना हुई या फिर इनलोगों ने होने ही न दी. साल में पांच - छः - सात यात्रायें हो जाती है परिवार सहित, अब आप सोचिये अगर थोड़ा का पानी ढो लें तो कितने बोतलों की बलि होने से बचा सकते हैं. अगर जरूरत से ज्यादा हेल्थ के प्रति जागरूक हैं तो फिर यह बोतल भी एक उपाय है, पर्यावरण बचाने में अपने योगदान के लिये. अभी तो एक बोतल ही ली है, इसकी सफलता के बाद फिर आगे की रणनीति बनेगी कि यह सबके बैग में जाने लायक है या नहीं....

Thursday, August 15, 2019

चल घूम आएं


सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ,
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ !!

फोटो: नैनीताल के रास्ते में कहीं (Yayavar Ek Traveler.com से साभार)

कुछ लोग मेरे घूमने - फिरने से जुड़े पोस्ट से बड़े आहत होते हैं और कई मित्र तो इतने जल - भुन जाते हैं कि बस देखकर मुहँ बना आगे बढ़ जाते हैं बिना लाइक, बिना कॉमेंट. और लगे हाथ बुदबुदा जाते हैं पता नहीं कहाँ से पैसे लाता है? 🤔

पर कुछ होते हैं थोड़े हिम्मत वाले, दिलेर 😝 टाइप. तो वो देखते हैं और फिर उलझन में पड़ जाते हैं कि आखिर इतना कोई कैसे घुमक्कड़ी कर सकता है? 🤔 तो ऐसे लोग कभी - कभी पूछ बैठते हैं अमा यार स्पॉन्सर कहाँ से लाते हो? 😜😂

तो आज मैं वही बता देता हूँ, शुभ अवसर है 15 अगस्त और रक्षा बंधन का और मोदीजी ने अपने देश के नाम संबोधन में भी सबको टारगेट प्लान दे दिया है 15 जगहों को तीन साल में घूमने का तो ऐसे लोग और बिलबिला रहें हैं. 😝😂

देखो भाई, मैं एक छोटी - मोटी नौकरी करता हूँ और जो छुट्टियाँ लोग पेट दर्द और सर दर्द में लेते हैं दफ्तर से मैं उसी छुट्टी में छोटी - मोटी घुमक्कड़ी करता हूँ. बाकी होली हो या दीपावली कौनो लेना देना नहीं. मतबल समझे, इसे कहते हैं कुर्बानी. बच्चे के स्कूल जाना हो या डॉक्टर को दिखाना हो बच्चों को वो सब गृहमंत्री देखती है. मने मुझे ऐसी छुट्टियाँ लेनी नहीं पड़ती, जिसके लिए बाकी दफ्तर के लोग अर्जी लगाते हैं. 😜😂     और इसके लिए गृहमंत्री को तैयार किया है कठिन ट्रेनिंग देकर, शादी के बाद से ही - स्वतन्त्र बनो.

इब मामला है पेसे का, आखिर घूमने - फिरने को पेसे तो चाहिए गुरु? 🤔तो वो भी पता ही दूँ.

अपन है बिल्कुल हटके, मने जे मैं नहीं कह रिहा हूँ 😜😂. 
जे हमरी श्रीमतीजी बोले हैं अपने सखियों से. 🤣😝 
तो भाई बात जे है मैं किसी पार्टी - वाटी में जाता नहीं, तो महंगे कपड़े, परफ्यूम, स्प्रे जरूरत न पड़ती मुझे और गिफ्ट लेना-देना भी होता नहीं. दारू पीता नहीं और न पब देखी कभी और कोई और ऐयाशी की कोई तलब न होती. मतलब कपड़े जरूरत के हिसाब से और सस्ते ही लेता अब. हाँ, एक ज़माना था, जब सबसे मंहगे ब्राण्ड पहनता था. पर अब एक टी शर्ट ही कई साल घसीट लेता हूँ, गृहमंत्री कई टी शर्ट और जींस की सर्जरीकल स्ट्राइक कर चुकी है- बेरंग हो गए, फटने लगे करके पर अपने को कोई फर्क़ पड़ता नहीं.

तो ये जो आप ऐयाशीयों पर ख़र्चते हो न, वही मैं घूमने पर ख़र्चता हूँ. 😜😍और एक मामला है, मुझे रुपये पैसे का कोई मोह - माया है नहीं कि माल आया तो तहखाने में दबा दो. 😝😂 अबे रुपये - पैसे खर्च करने के लिए होते हैं. गधे की तरह कमा क्यों रहे हो जब उसे खुद भी भोग ही न पा रहे?

तो इतना लिखने का मतबल जे है कि थोड़ा सोचो, विचारों, काहे कुंए के मेढक बने हो? और यही वजह है डिप्रेशन में जाते हो, अपनी समस्याओं को लेकर बैठ रोते रहते हो दिन-रात. नींद नहीं आती तो नींद की गोली ले रहे, ब्लड प्रेसर बढ़ रहा आदि-आदि. और डॉक्टर साहब को जाकर तहखाने से निकाल - निकाल माल पहुंचाते हो कि वो ठीक कर देगा. कुछछू नै कर पाएगा आपका डाक्टरवा, बस माल समेटता रहेगा जब तक जिन्दा रहोगे. क्योंकि इलाज पत्ते का कर रहे हैं और बीमार है जड़ मन. उसे घुमाओ - फिराओ, मौज - मस्ती करने दो, मन मयूरा को नाचने दो. अब नाचने दो मतलब शादियों में होने वाला नागिन डान्स मत समझ लेना. 😜😂
कुछ समझ आया हो तो बताना, बड़बड़ाते आगे मत निकल जाना, बिना लाइक और कॉमेंट किए. और जिन्हें और मिर्ची लगी हो, जाओ दारू पियो और मरो. अब अगले जन्म में ही आदमी बनने की कोशिश करना.
😝😜😂

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