अंशुमान चक्रपाणि का दशकों पुराना ब्लॉग नक्कारखाना (Nakkarkhana), विचारों के सैलाब को शब्द देने का एक माध्यम है.
www.Nakkarkhaanaa.blogspot.com
Saturday, July 5, 2014
प्रकृति के साथ दो पल…
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चित्र आलेख
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Tuesday, November 12, 2013
साहित्य विनोद : एक नई ब्लॉग की शरुआत
http://sahityavinod.blogspot.in
जल्द ही आपलोगों के सामने प्रस्तुत होने वाली है पिताश्री को समर्पित एक नई ब्लॉग जिसमें अपने पिताश्री की रचनाओं की मोतियों की माला आपलोगों के सामने लानेवाला हूँ | कृपया कुछ इंतज़ार करें ...
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फिर नई शुरुआत
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Tuesday, July 16, 2013
समस्या स्वर्ण की …..
आज ही हमारे वित्तमंत्रीजी का एक बयान देखा जिसमे उन्होंने हिन्दुस्तान के लोगों को सलाह दी है कि लोगों को स्वर्ण एवम स्वर्ण निर्मित आभूषणों के प्रति मोह छोर देना चाहिए | क्यूंकि इससे देश को काफी नुकसान उठाना पर रहा है और देश की अर्थव्यवस्था सिर्फ लोगों के स्वर्ण एवम स्वर्ण निर्मित आभूषणों के प्रति मोह के कारण बेपटरी हुई जा रही है | मैंने जब वित्तमंत्रीजी के बयान पर गहन विचार किया तो भाई मैं तो समुंद्र में उठने वाले ज्वार-भाटा के सामान विचारों के भवर में उलझ गया | मुझे लगता है कि हमारे वित्तमंत्रीजी ने काफी रिसर्च किया है इस मुद्दे पर, और उन्होंने कसम खा ली है कि चाहे जो हो जाए पर लोगों के स्वर्ण के मोह को वो भंग करके ही रहेगे | तभी तो स्वर्ण के खरीद-बिक्री पर वित्तमंत्रीजी जी पाबंदी लगाने के लिये तरह-तरह के नुस्खे आजमा रहें हैं, जिसके कारण बेतहाशा बेलगाम होती महँगाई पर ध्यान देने के लिये उन्हें समय ही नहीं मिल पा रहा है | भाई, अब बात ये है कि एक ही आदमी से कितना काम करवाओगे | बेचारे वित्तमंत्री ठहरे एक और काम अनेक | क्या-क्या देखे बेचारे … भुखे-नंगे लोगों को सुने जो फालतु में महँगाई-महँगाई चिल्ला रहें हैं | अब मूर्खों जनता को कौन समझाये कि भाई महँगाई ज्यादा होने से ये पता चलता है कि देश तरक्की कर रहा है और सब के पास धन-दौलत मौजुद है | या इस डालर को संभाले जो बिरोधियों के इशारे पर नाच रही है | या फिर पेट्रोल की कीमत को संभाले जो अमेरिका की इशारे पर हमारे वित्तमंत्री को बदनाम करने में लगा है | एक आदमी को अगर इतने सारे मुद्दे सुलझाने हों तो जाहिर सी बात है कोई भी हो, आखिर शुरुआत तो एक से ही करेगा ना | तो भाई आपलोग थोडा इन्तजार करो | जैसे ही वित्तमंत्रीजी स्वर्ण की समस्या को सुलझा लेंगे, बाकी समस्यों पर भी ध्यान देंगे |
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व्यंग्य
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Saturday, February 16, 2013
वित्तमंत्री जी से गुहार...
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कविता
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
नव वर्ष अभिनंदन...
| स्व. विनोद कुमार, M.A., LLB., भुतपूर्व स्टेशन प्रबंधक, पु. रेलवे |
स्वर्गीय पिताश्री की लिखी एवम अनुभूति हिंदी बेब पत्रिका पर नववर्ष पर लिखी गई यह कविता पुनः नववर्ष में उनकी याद दिला रहा है :
भेजा ई-मेल
पूछा ओस्लो और अलास्का से
कैसा है नव वर्ष
कैसा रहा गत वर्ष
बोला बेहतर है
पूछो एस्किमो से
ध्रुवप्रदेश में छूट रहा था
रंगबिरंग अग्नि प्रदर्श
हिमखंड टूट कर बिखर रहा था
मंगल ग्रह से पूछा
तो वह चिहुँक उठा
देखो तेरे घर से आया
कौन है उतरा मेरे प्रांगण
आकाश गंगा और
ब्रह्मांड के सूर्येत्तर महासूर्य से
रेडियो भाव में पूछा'
तो रेडियो तरंग को शून्य पर
टिका हुआ ही पाया
होनोलुलू और होकाइडो के
मछुआरों को
चंद्रज्योत्स्नास्नात जलगात पर
मोटर ट्राली कसते पाया
भूकंपघात से त्रस्त निपात
'बम' शहर को थोड़ा सहलाया
पाया खुले आकाश के नीचे
आँसू व सिहरन भी ठहर गई है
गुलमर्ग खिलनमर्ग में
हिम क्रीड़ा यौवन खिलखिलाकर
मेरी ओर हिमकंदुक उछाल कर बोली
'सारे जहाँ से अच्छा
हिंदोस्तां हमारा'
मैं रम्यकपर्दिनि शैलसुता
हिम क्रीड़ा में
किस के साथ है मेरी तुलना समता
उत्तर अभिमुख अयन अंश पर
पूरे भूमंडल को
सर्द ठिठरन में ठिठका पाया
तब भी दिनमान का
स्वर्ण हिमपाखी
सत्वर उड़ता जाता
आओ हम सब
धरती को स्वर्ग बनाएँ
ओजोन परत में
कुछ रफू कराएँ
व्यापार विस्तार महत्वाकांक्षा तज
आतंकमुक्त चंद्र मंगल की ओर
धीरे-धीरे कदम बढ़ाएँ
हर दिन नव वर्ष के
प्रेम मंगल गीत हम गाएँ|
-स्व.विनोद कुमार
(भुतपूर्व स्टेशन प्रबंधक,
पु. रेलवे)
जमालपुर, मुंगेर
(http://www.anubhuti-hindi.org/chhandmukt/v/vinodkumar/index.htm से साभार )
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कविता
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
आओ फिर से दिया जलाएं...
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कविता
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Thursday, January 19, 2012
सर्वसुलभ चिकित्सा पद्धति
हमारी सरकार के साथ-साथ निजी कंपनियां और शोध संस्थाएं निरंतर शोध संवर्धन और पेटेंट के
प्रति इतनी गंभीर नहीं है, जितनी अमेरिका और यूरोप की सरकार है| हमारे यहाँ अति प्राचीन काल
से घृतकुमारी (एलोवेरा), नीम, हल्दी, हरीतकी, तुलसी, जामुन, गुगुल, शंखपुष्पी, ब्रह्मी, सर्पगंधा
आदि अनमोल जड़ी-बूटियों का उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार के लिए किया जाता है| आज भी हम
इनका उपयोग औषधि निर्माण-उत्पादन एवं संग्रह के लिए अर्क-आसव-अरिष्ट, तैल, अवलेह, बटी,
चूर्ण, रसायन, पर्पटी आदि के रूप में करते हैं| हमने शोध, विकास और पेटेंट पर तब तक कोई
ध्यान नहीं दिया जब तक कोई अमिरेकी कंपनी ने उसका पेटेंट कराकर हमें झटका नहीं दिया|
हमारे देश के ३६ प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे हैं, जिनके लिए पेट की भूख
मिटाने के लिए दो वक्त की रोटी और तन की लाज बचाने के लिए दो हाथ कपड़ा का जुगाड़ भी
शरीर तोड़ मेहनत करने के बाद भी नहीं हो पता है, ऐसे में अत्यंत महंगे ईलाज तो ऐसे लोगों के
लिए दिवा स्वप्न ही है| उनके लिए सर्वसुलभ चिकित्सा प्रणाली के तहत योग-ध्यान,स्वमूत्र-गोमूत्र,
होम्योपैथी, सिद्ध यूनानी, आयुर्वेद आदि का प्रचार-प्रसार शुद्ध मन से करने की आवश्यकता है| इन
क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों और संस्थाओं को संरक्षण एवम सहायता प्रदान कर उनके विकास को
सुनिश्चित करने का प्रयास भी सरकार को करना चाहिए ताकि करोड़ों लोगों को एलोपैथी के
ग्लैमर-मायाजाल एवम साइड इफेक्ट से बचाया जा सके| आज हर विदेशी दवा कंपनी भारत को एक
आकर्षक एवम बड़े बाजार के रूप में देखती है| इनका उद्देश्य बस किसी भी उल्टे-पुल्टे फार्मूले से
तैयार दवाओं को बेचकर अधिक-से-अधिक कीमत वसूल करना है| अभी हाल में अमेरिका और
यूरोप में किये गए सर्वेक्षण के अनुसार ३५ प्रतिशत से जयादा लोग एलोपैथी को त्याग कर वैकल्पिक
चिकित्सा पद्धति को अपना चुके हैं और बाकी लोग भी इस ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं| सिर्फ
भारत में ही एलोपैथी चिकित्सा एवम दवाओं की मांग में लगातार वृद्धि हो रही है| यही कारण है
किसी भी विदेशी दवा कंपनी भारत के बढ़ते बाजार में अपना पैर फैलाना चाहती है| इसलिए समयपूर्व
हमें जागने की जरूरत है ताकि स्वास्थ्य, धन एवम बहुमूल्य समय को बचाया जा सके| कुछ ज्यादा
नहीं, थोड़ी चेतना जगाकर ही भारतीय योग, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, स्वमूत्र-गोमूत्र चिकित्सा
प्रणाली आदि का भविष्य आसानी से उज्ज्वल बनाया जा सकता है और विश्वव्यापी दवा माफिया से
करोड़ो लोगों को बचाया जा सकता है |
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विचार-विमर्श
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Sunday, January 15, 2012
कविता
पुलिस
पहले
पहले
गुंडों से बचने से जनता,
जाती थी पुलिस के पास |
अब
पुलिस के मारे बेचारे,
सर झुकाती है गुंडों के पास |
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कविता
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Tuesday, December 6, 2011
टेक गुरु ...
आज इन्टरनेट और तकनीक का कमाल ही है की भागलपुर में बैठकर दिल्ली के किसी भी इलाके की जानकारी मिल जाती है, और तो और वाकायदा इलाके की सेटेलाइट से ली गईं तस्वीर भी उपलब्ध हो गई| है ना तकनीक का कमाल|
असल में हुआ यूं की मेरे एक मित्र ने दिल्ली से ही फोन किया की भाई साहब, जरा मुझे दिलशाद गार्डन से नॉएडा जाने का मार्ग बताएँ| अब चुकीं ये बात ठीक है की मैं काफी दिनों तक दिल्ली में रहा, पर मियां ये जरूरी तो नहीं की मैं दिल्ली के हर इलाके को जानू| लेकिन जनाब को मैं अपने ज्ञानी होने पर संदेह नहीं होने देने चाहता था, और दुसरी बात ये भी थी की जनाब कुछ परेशान भी थे, इस वजह से उनसे ये कहकर की मुझे रास्ता नहीं मालूम और परेशान नहीं करना चाहता था| खैर मैंने कहा भाई, मैं आपको बस कुछ देर में कॉल बैक करता हूँ, उन्होंने झट से कहा की बिजी हो क्या ? इक बार तो मैंने सोचा की उन्हें बता दूं की मुझे रास्ता नहीं मालूम, पर जैसे ही उन्होंने कहा बिजी हो क्या? तो मैंने भी सोचा क्यों अपनी इज्जत अपने साथ से उतारू और मैंने भी कह दिया हाँ |
झट से मैंने अपने इंटरनेट (मायाजाल) चालू किया और गूगल मैप पर पहुँच गया| और बस और क्या चाहिये था| बस कुछ मिनटों में रूट की सारी जानकारी मेरे पास थी, जो की मैंने नोट कर ली की कहीं भूल ना जाऊ| और दस मिनिट्स में मेरे फोन करने के पहले जनाब का ही फोन आ गया| और फिर क्या था मैंने बड़े शान और रौब से जनाब के सारा रूट बकायदा टर्न, फ्लायओवर और लाल बत्ती के उन्हें समझा दिया| जनाब तो खुश हो ही गए बोले मुझे पता था आपके अलावा मुझे और कहीं से सही जानकारी नहीं मिलेगी| मैं तो इन्टरनेट की वजह से ज्ञानी बना रह गया और लगे हांथों जनाब को दिल्ली मैप रखने की सलाह भी दे डाली| उन्होंने भी कहा ठीक कहा भाई, दिल्ली जैसे बड़े शहर में तो बिना मैप के कहीं जाने-आने में बड़ी पड़ेशानी होती है|
अब मैं आपलोगों को इस पुरे कहानी की सब से अहम बात बताता हूँ| ये वो जनाब हैं जो पुरे दिन इन्टरनेट और फेशबुक पर उपलब्ध रहते हैं. लेकिन जब ट्रेन टिकेट्स की जरुरत होती है तो रिज़र्वेशन काउन्टर की ओर दौड़ते हैं और जब किसी नये जगह जाने की बात होती है तो लोगों से पूछते फिरते हैं|
इसलिए कहता हूँ सिर्फ स्मार्टफोन रखने से कोई ना तो स्मार्ट बन जाता है, जब तक की उसे स्मार्टली इस्तेमाल करना ना आता हो, और लैपटॉप, कंप्यूटर और इन्टरनेट रहने से ही बन्दा टेक गुरु नहीं हो जाता| जबतक की उसका सही इस्तेमाल करना नहीं आता हो|
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व्यंग्य
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Monday, December 5, 2011
विक्रमशिला विश्वविद्यालय...
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नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
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फिर नई शुरुआत
काफी लंबे समय के बाद अब फिर से अपने ब्लॉग पर लिखने की सोच कर इसे अपडेट कर रहा हूँ | उम्मीद है अपनी लेखनी को फिर से जिंदा कर सकूं, जो की पिताश्री के देहांत के साथ ही बंद हो गया| पिताश्री ही मेरे लिखनी के मूल श्रोत थे | उन्होंने मेरे छोटे-से-छोटे विचारों को भी विस्तृत कर एक नया आयाम दिया | मेरी अब तक की प्रकाशित रचनाओं में चाहे वो विभिन्न समाचार-पत्रों में छपी हो या पत्रिकाओं में, उनके विचारों ने एक अहम भुमिका निभाई| उनके जैसी विस्तृत विचारों का धनी होना, अपने आप में एक उपलब्धि है |
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फिर नई शुरुआत
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
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