Wednesday, August 29, 2018

केश कर्तनालय गाथा

आज दफ्तर का साप्ताहिक अवकाश का दिन है, ये इसलिये बता रहा हूँ कि इस प्राणी का रविवार नहीं होता | अभी बिस्तर पर निद्रा देवी की आगोस से अलसाया उठा ही था और मदहोशी छाई हुई ही थी कि सुबह-सुबह बेटे ने गुसलखाने में घुसने के पहले ही तुगलकी फरमान सुना दिया –
आज पापा मुझे स्कूल बस में छोड़ने जायेंगे, नहीं तो मैं स्कूल नहीं जाऊंगा|

छुट्टी का दिन मतलब एक दिन की बेरोजगारी | श्रीमतीजी ने भी मुस्कराते हुए कहा छोड़ आइये ना आप ही | बेचारा शादी-शुदा निरीह-सा आदमी नामक प्राणी कर भी कर सकता है इस परिस्थिति में | मैं भी घुस गया जल्दी से दूसरे गुसलखाने में, आखिर बस स्टैंड पर छोड़ने जाने के पहले नित्य-क्रिया से निवृत होने के साथ थोबड़े को थोड़ा दुरुस्त तो करना ही था | बेटे के तैयार होते-होते मैं भी तैयार होकर अपनी फटफटिया निकाली और नखरिले नटखट को बस स्टैंड छोड़ आया |

घर वापसी के पहले अपने हवाओं में लहराते टेढ़े-मेढे जुल्फों को थोड़ा रास्ते पर लाने के लिए केश कर्तनालय का रुख किया | अपने पसंदीदी केश कर्तनालय में घुसने के पहले बता दूँ, ये है तो छोटा सा केश कर्तनालय पर नये-नवेले लौंडों की भीड़ मधुमक्खी के छत्तें की तरह लगी रहती है | कारण... कारण ये है कि राजा जो इस केश कर्तनालय के संचालक हैं के साथ में जादू है | आपको चाहे किसी भी फ़िल्मी हस्ती के घोसले को अपने खोपड़ी पर बनवानी हो या खोपड़ी को आजकल की नई चलन के हिसाब से आधी सफाचट, आधी घोसले में तब्दील करवानी हो, सब करता है ये राजा भाई और वो भी बिना जेब काटे | मैं इतना क्यों बता रहा हूँ इस केश कर्तनालय के बारे में, कहीं ये कोई प्रोमोशनल या स्पोंसर्ड पोस्ट तो नहीं???

अरे नहीं भाई, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं, असल में यही तो मेरे दुःख का कारण हैं | मैं अपनी जुल्फों की कटाई- छंटाई तब तक टालता रहता हूँ, जब तक मेरी शक्ल भालु जैसी नहीं हो जाती | इसका कारण है केश कर्तनालय में जमी मधुमक्खी के छत्तें सी भीड़, जिसके कारण अपनी पारी के इंतजार में दो-दो घंटे बिताने पड़ते हैं | और आज तो छोटे नवाब की भी जुल्फों को सवारना था, जो भालू जैसी हुई नहीं थी पर अगले साप्ताहिक अवकाश तक हो ही जाने वाली थी | मतलब आज ढाई-तीन घंटे का सत्यानाश वो भी उस साप्ताहिक अवकाश वाले दिन जो पन्द्रह दिनों  बाद मिल रही हो | खैर किया क्या जाये, कहीं और जाने से संतुष्टि भी नहीं मिलती | लेकिन जैसे ही अपनी फटफटिया बाहर खड़ी कर अन्दर गया तो पता चला कि आज भीड़ नहीं है और एक, जिनकी लहलहाती हरी-भरी जुल्फों की बगिया को बेरहमी से रेगिस्तान बनाया जा रहा था के बाद मेरे ही खोपड़ी पर कैची और उस्तुरा वाला हाथ फिरने वाला था | खैर, लगभग पन्द्रह मिनट में अपनी बारी आ गई और अपनी जुल्फों की कटाई-छंटाई, खाद-पानी का काम इतनी जल्दी निपट जाने से मन ही मन खुश भी था |

अब आप कहेंगे बेकार ही इतना चिल-पो कर रहा हूँ और एक फालतु पोस्ट भी लिख डाला | रुकिए ... रुकिए मेरा दुःख अभी समाप्त नहीं हुआ | छोटे नवाब को छुट्टी के बाद लेकर जब दोपहर में वापस उसी केश कर्तनालय पहुँचा तो पता चला कि पांच-छः लौंडे जमें हैं पहले से | मतलब कम-से-कम ढाई-तीन घंटे तो लगने ही थे | फिर सोचा नहीं इतना समय नहीं दे सकता तो चल पड़ा दूसरे केश कर्तनालय की ओर जो पास में ही था | वहाँ भी चार लोग जमें थे तो फिर तीसरी केश कर्तनालय में चला गया | हाँ, यहाँ भीड़ नहीं थी, सुबह जैसे मुझे संयोग से ऐसा मिल गया था मेरे पसंदीदा केश कर्तनालय में सिर्फ एक | कुछ ही देर में छोटे नवाब ठाठ से बैठ अपना केश बनवा रहे थे और मैं बैठा सोच रहा था क्या हम पुरुष अपनी केश की थोड़ी-मोडी कटाई-छंटाई खुद से घर पर नहीं कर सकते क्या ??? कुछ तो जुगत लगानी पड़ेगी, अब इतने समय की बर्बादी मैं केश कर्तनालय में फालतु बैठकर तो नहीं कर सकता | 

जो रास्ते मुझे सूझ रहें हैं वो ये हैं :

१. पहला बात जो मेरे कुराफाती खोपड़ी में आ रही थी वो थी अपनी केश-सज्जा या कटाई-छंटाई खुद करना | अब वो बाद में कैसा दिखता हैं, ये देखने वाली बात होगी | लेकिन ये होगा कैसे ??? देखता हूँ, शायद कोई मिल जाये जुगत बताने वाला |


२. अपनी लहलहाती हरी-भरी जुल्फों की बगिया को, भले ही थोडा 
रेगिस्तानी इलाका भी है, बेरहमी से रेगिस्तान बना डालूं और उसे जैसे दाढ़ी बनाता हूँ वैसे ही क्रीम पोतकर चिकनाता रहूँ | केश कर्तनालय का जिन्दगी भर का झंझट ही खत्म |

३. जैसा चल रहा है वैसा चलने दूँ, बस कोई टुटपुंजिया-सा केश कर्तनालय की खोज कर लूँ ताकि अधिक समय बर्बाद ना करना पड़े | अब वो चाहे कैसा भी शक्ल बना दे, समय तो बचेगा |

यही थी मेरी बड़ी परेशानी, मेरी समस्या |

Tuesday, July 17, 2018

हम कितने जिम्मेदार हैं???

गंगटोक से लगभग 55 किमी० की दूरी और  १३८०० फीट की उचाई पर अवस्थित है बाबा हरभजनसिंह मंदिर जो कि छंगू लेक से लगभग १६ किलोमीटर की दूरी पर है इस मन्दिर की संक्षिप्त कहानी मैं दूसरे पोस्ट में शेयर करूँगा । ये पुरा परिशर आर्मी के द्वारा संचालित होता है यहाँ तक की इतनी उंचाई होने के बाद भी आगंतुकों के लिये आर्मी कैफेटेरिया भी चलाती हैजहाँ की चायसूपबिस्किट्सकेकनमकीन आदि उपलब्ध है बिल्कुल ही सिक्किम के मूल्य पर पर हम इसका क्या हस्र करते हैं ये नजारा इसका एक दुखद उदाहरण है |

ये नज़ारा मेरे लिये इस यात्रा का सबसे दुखद पहलु लिये है लोगों ने ये नजारा तब बनाया है जबकि कैफेटेरिया के अन्दर ही हर कोने में कचरे का डब्बा रक्खा था |

स्वछता को इश्वर का प्रतिक माना गया है भारतीय संस्कृति मेंक्या पहाड़ों और वादिओं में इस तरह का ओछापन और मानसिक दिवालियापन शोभा देता हैहमलोग इस कैफेटेरिया में लगभग ३० मिनट रुके और सूपबिस्किट्सकेक आदि खाकर अपनी थकान और भुख मिटाई इस ३० मिनट में जवानों ने दो बार टेबल साफ की लेकिन १५ मिनट में फिर से हालात वहीये पिक्चर मैं सफाई के १० मिनट के बाद ली है मैंने खुद अपने बगल में बैठे कुछ बंगाली जोड़े को ऐसा करने से मना कियालेकिन सुनता कौन हैं |

ये है हमारा सभ्य और संभ्रांत समाज। शर्म आनी चाहिये ऐसे घूमने वालों को जो जो कम से कम इन्सान कहलाने के लायक तो नहीं। अब आप इसे क्या कहेंगेआप खुद सोचें। मैंने जब कुछ लोगों को मना किया तो एक जोड़े ने मुझे सपाट शब्दों में कह दिया "Mind your business".




Thursday, July 12, 2018

"यायावर एक ट्रेवलर" फिर नई शुरुआत

किसी ने क्या खुब कहा है -
"मंजिल मिल ही जायेगी भटकते ही सही,
गुमराह तो वो हैं जो घर से निकलते ही नहीं ."

सैर पर जाना या घुमक्कड़ी हर किसी किस्मत में नहीं. बिरले ही इस सौगात से नवाजे गये हैं. मुझे तो लगता है अगर एक सालमात्र एक साल कहीं यात्रा ना करूँ, तो मानसिक संतुलन ही खो दूँगा. जाने लोग पूरी जिंदगी बिना यात्रातीर्थाटन और सैर-सपाटे के कैसे बिता देते हैं. 

मस्तिष्क को चिंतनशील और क्रियाशील बनाने के लिये यात्रा करना बहुत जरुरी है. यात्रा करने से चूँकि वातावरण परिवर्तन हो जाता हैइसलिए मनुष्य के मन और मस्तिष्क में नवीनता आ जाती है. आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिये यात्रा एक महत्वपूर्ण साधन है. जो लोग दब्बू और संकुचित मानसिकता वाले हैंऐसे लोगों के लिये सैर-सपाटा एक अच्छा माध्यम हो सकता है आत्मनिर्भर बनने का.

यात्रा के जैसा कोई दूसरा सीखने और अनुभव करने का तरीका नहीं है. यात्रा आपको अपने क्षितिज विस्तृत करने और सीखने का नया आयाम प्रदान करता है. यात्रा आपको नई चीजेंनए भोजननए जगहोंभिन्न - भिन्न लोगों और नई संस्कृतियों को समझनेमहसूस करने की अभूतपूर्व अवसर प्रदान करता है. आप यात्रा में हवा में हों या सड़क पर हैंहर दिन नए अनुभवों के साथ आने वाली चुनौती से निपटते हैं.

निकले थे इस आस पे किसी को बना लेंगे अपना,
एक ख़्वाइश ने उम्र भर का मुसाफिर बना दिया.

पर्यटन को दुनिया का सबसे बेहतर इन्वेस्टमेंट कहा गया हैक्यूँकि ये इनवेस्टमेंट आप अपने आप में करते हैं.

World best investment advice:
"Investment in Travel is an Investment in Yourself."
~Matthew Karsten

इस भाग-दौर भरी जिन्दगी में अपनी यात्राओं (घुमक्कडी) के लिए जो भी थोड़ा समय निकाल पाता हूँ, उसके जुड़े अनुभवों को शब्दों में पिरोने की कोशिश कर रहा हूँ. इसका एकमात्र मकसद सिर्फ अपने लिए ट्रेवल डायरी और आपके लिए जानकारी को एक जगह लाने का प्रयास मात्र है. मैं कोई लेखक नहीं, पिताश्री के बाद ना ही कोई मार्गदर्शक बचा. जो भी टूटी-फूटी भाषा आती हैं, बस लिख रहा हूँ. ना मुझे हिन्दी का बहुत अच्छा ज्ञान हैं और ना व्याकरण का. गलतियाँ तो होंगीं. सुझाव देने का कष्ट करेंगे, तो शायद सुधार पाऊं. "यायावर एक ट्रेवलर" पर आप मेरी यात्रा संस्मरण को पढ़ सकते हैं.

Friday, June 8, 2018

गावों का विकास

गावों का विकास

एक लंबे अर्से बाद  ननिहाल जाना पड़ा बीमार मामू को देखने के लिये। पूर्णियां से लगभग 45 किलोमीटर दूर  के गाँव में। यह लंबा अर्सा कुछ ज़्यादा ही लंबा है, लगभग 21 - 22 साल। नाना - नानी के स्वर्गवासी होने के बाद से कभी मेरा आना नहीं हुआ। 21 - 22 साल पहले यहां आने के लिये, बनमनखी से कोई सड़क नहीं थी, लोग 6-7 किलोमीटर नहर के किनारे पगडण्डी पर चलकर जाते थे या बैलगाड़ी थी वो भी चंद लोगों के पास। यही एक मात्र साधन था आने - जाने का। पर बिहार के विकास ने इस गाँव को भी नहीं छोड़ा और अब यहाँ भी बिजली, सड़क, दुकानें सब कुछ है, दुकाने पहले भी थी, पर सिर्फ छोटी - मोटी जरूरत का सामान और खाने पीने का सामान के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलता था, पर अब मोबाइल, सीमेंट, बालू, हार्डवेयर, सब्जी, मिठाई, जूस, चाय सब कुछ है। गाँव से सीधी बस सेवा पूर्णियां और कटिहार के लिये दिनभर और बनमनखी के लिये ऑटो भी चलती है। ये तो बस थोड़ा परिचय था ताकि मेरी बात समझने में आसानी हो।

अब आइये सीधी बात पर। मुझे 21 - 22 साल बाद आने के बाद जो बदलाव दिखाई दिया उससे आपको पहले ही अवगत करा दिया, बिजली, सड़क, दुकानें सब कुछ है, अब यहाँ। दो दिन बिताने के बाद जो सबसे बड़ा विकास मुझे दिखाई दिया, वो असल विकास न होकर गाँव का पतन था। अब आप कहेंगे की विकास तो दिख रहा है।  हाँ जनाब, विकास तो दिख रहा है, पर लोगों का जीवन शैली वही है, पर दिखावा बढ़ गया। सरकार ने इंदिरा आवास योजना के तहत घर बनाने के लिये पैसे दिये, पर लाभान्वित और दलालों की नीयत साफ नहीं होने की वजह से दोनों ने मिल बाँट खाया, और जिंदगी वही 21 - 22 साल पहले वाले झोपड़ी में बीता रहें हैं, ये अलग बात है कि झोपड़ी में गैस चूल्हा, टीवी, मोटर बाइक सब है।

अब आइये गाँव के असली विकास पर नज़र डालें। सड़क और आनेजाने की सुविधाएं बढ़ गयी, जिसका असर ये हुआ कि शहर की बुराई ने यहाँ अपना पाँव फैलाया। बिहार में नीतीश जी ने शराबबन्दी कर रखी है, पर क्या कभी मुख्यमंत्री महोदय ने खुद पड़ताल करने की कोशिस की, शराबबन्दी असल में है भी या सिर्फ़ एक शिगूफा है शराबबन्दी? पूरा गाँव शराब (महुआ) के गिरफ्त में है। क्या गाँव के धनाढ्य, क्या निर्धन। जो भी मिला, दिन या दोपहर, शाम या रात भरपूर कोटे के साथ, नशे में धुत। गाँव में लोग इसकी वजह से अपना सेहद के साथ परिवार का सत्यानाश कर रहें है।

21 - 22 साल के बाद मेरे आगमन के वजह से जो मिला उसने पूछा क्या बदलाव नज़र आया। मुझे तो बस लोगों का पतन ही दिखाई दिया, विनाश ही चहुओर नज़र आया। जो भी रोजगार के अवसर बढ़ने से आमदनी बढ़ी, वो सब शराब की भट्टी, प्यासी और अतृप्त आत्मा की तरह पी रही है। यही है बिहार के असली विकास की कहानी और शराबबन्दी का असली सच। 

Thursday, June 8, 2017

लीची के आश्चर्यचकित फायदे

Photo by @ Alka Bharti


लीची गर्मियों का एक प्रमुख फल है. स्वाद में मीठा और रसीला होने के साथ ही ये सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद है.

छोटी-सी लीची में कार्बोहाइड्रेट
, विटामिन सी, विटामिन ए और बी कॉम्प्लेक्स, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, आयरन जैसे खनिज लवण पाए जाते हैं, जो इसे काफी फायदेमंद बना देते हैं।

इसमें 66 कैलोरी प्रति 100 ग्राम की मात्रा में उपलब्ध होती है।साथ ही  इसमें सैच्युरेटेड फैट या संतृप्त वसा बिल्कुल भी नहीं होता। 

प्रति
100 ग्राम लीची में विटामिन-सी की मात्रा 71.5 मिलीग्राम होती है, जो प्रतिदिन की  आवश्यकता का 119 प्रतिशत है

लीची में मौजूद पोटेशि‍यम ब्लड प्रेशर को नियंत्रित कर ह्दय-गति और खून की चाल को नियंत्रित करता है
, जिससे हृदय रोग या अटैक की संभावना कम होती है। 

बीटा कैरोटीन और ओलीगोनोल से भरपूर लीची दिल को स्वस्थ रखने में मददगार है.

लीची एक अच्छा ऐंटीऑक्सिडेंट भी है। इसमें मौजूद विटामिन सी हमारे शरीर में रक्त कोशिकाओं के निर्माण और लोहे के अवशोषण में भी मदद करता है
, जो एक प्रतिरक्षा प्रणाली को बनाए रखने के लिए जरूरी है। जो आपकी त्वचा को स्वस्थ और खूबसूरत बनाए रखने में सहायक हैं। 

इसमें घुलनशील फाइबर बड़ी मात्रा में होते हैं, जो मोटापा कम करने का अच्छा उपाय है। फाइबर हमारे भोजन को पचाने में सहायक होता है और अंदरूनी समस्याओं को रोकने में मदद करता है।
लीची विटामिन सी का बहुत अच्छा स्रोत होने के कारण खांसी-जुकाम, बुखार और गले के संक्रमण को फैलने से रोकती है।

ऑथ्राईटिस, दमा के मरीजों के लिए, सीने और पेट की जलन में, यदि कफ की शिकायत बनी रहती है, अगर आप वजन कम करना चाहते हैं तो लीची इसमें भी आपके लिए बेहद फायदेमंद फल है
 

Monday, November 16, 2015

धर्म-निरपेक्ष



 हज के लिये
सपसिडी देना
धर्म-निरपेक्षता है |
पूजा का
नाम लेना भी
साम्प्रदायिकता है |

Wednesday, September 3, 2014

कुरियर कंपनी ब्लू डर्ट का गोरख धंधा …

१९९० के दशक में भारतीय डाक विभाग के विसंगतियों और डाक वितरण में आयी खामियों या निकम्मेपन की वजह से देश में प्राइवेट कुरियर कंपनियां कुकुरमुत्ते की तरह पनपे और बढ़े | डाक से भेजी गये पत्र, पार्सल, मनी आर्डर आदि गंतव्य तक नहीं पहुँच पाना जैसे साधारण सी बात हो गई और इस बारे में कहीं किसी जगह कोई शिकायत सुननेवाला कोई नहीं था | पहले- पहल तो डाक-पाल से ही मान-मनोव्वल भरे लहजे में शिकायत  किया जाता  ताकी अगर उसके पास बिना वितरण के पड़ा होगा तो आज या कल तक तो वो इसे दे ही देगा और कई बार ऐसा होता भी था की आपने शिकायत  की नहीं की आपकी डाक आ गई | मान-मनोव्वल भरे लहजे में शिकायत  इस लिये किया जाता था क्यूंकि भविष्य में फिर तो उसी से पत्र, पत्रिका, पार्सल, मनी-आर्डर प्राप्त करना है | अगर गुस्सा गया तो पता चला की आने वाले हर डाक को फाड कर फेक दे तो हम क्या कर सकते थे | ऐसा इसलिए होता था क्यूंकि डाकपाल साधारणतया उसकी नज़र में फालतु सा लगने वाले डाक को पोस्ट ऑफिस  में ही कूड़ेदान में डाल देता है या फिर ठण्ड के दिनों में आग जलाकर उस फालतु से (उसकी नज़र में ) डाक से ठण्ड से निजात पाने का जुगाड़ करने के लिये उसे पोस्ट ऑफिस के किसी कोने में फेकता जाता है | अगर इससे भी बात नहीं बनती तो हम ज्यादा-से-ज्यादा पोस्ट मास्टर से शिकायत करने पहुँच जाते और दो-चार बातें चिल्ला-चिल्ला कर सुनाकर अपने दिल की भड़ास निकाल लेते और बेचारे पोस्ट मास्टर साहब डाक पाल को बुला कर हिदायत देकर भेज देते लेकिन सुधरता तो कुछ भी नहीं था |

ये वजह थी देश में प्राइवेट कुरियर कम्पनियों के  कुकुरमुत्ते की तरह पनपे और बढ़ेने की | और धीरे-धीरे हम लोग कुरियर कंपनियों पर पूरे निर्भर हो गये | चुकी लोगों की सोच बदलने लगी | अब सस्ती नहीं बल्की विश्सनीयता का माप-दंड चल पड़ा, जल्द से जल्द गंतव्य तक पहुचानें का महत्त्व हो गया | डाक विभाग न सिर्फ अपनी विश्सनीयता पूरी तरह से खो चुका था बल्कि और दिन-ब-दिन उसमे गिरावट होती गयी |

इन सब कारणों से कुरियर कंपनियों की चांदी होती गयी और लोग धीरे-धीरे पोस्ट-ऑफिस की डाक सेवा के बदले कुरियर कम्पनीयों पर निर्भर होते चले गये |

अब हालत ये है कि कुरियर कंपनियां हरेक पैकेट या हरेक पार्सल पर ग्राहकों से मोटी रकम तो वसूलती है, लेकिन वो गंतव्य तक पहुंचेगी इसकी कोई गारंटी नहीं |  यानि जहां से चले थे एक लंबे रास्ते चल वापिस वहीँ पहुँच गये | हालत फिर वही डाक विभाग वाली हो गई | मेरी ब्लू-डार्ट जैसी नामी-गिनामी कुरियर कंपनी की सेवा का एक नहीं कई बार का अनुभव है | डाक जिसे कुरियर कंपनियां अंग्रजी में कांसिग्न्मेंट कहते हैं, दिल्ली से चली जिसके बदले डाक विभाग से तीन गुना राशी कंपनी ने वसूल की, लेकिन पुरे एक महीने बाद तक वो दिल्ली से भागलपुर नहीं पहुँच सकी | सबसे कमाल की बात तो ये कि कंपनी की वेब-साईट पर मेरे कांसिग्न्मेंट को वितरित या प्राप्त हुआ दिखा दिया गया और वो भी सिर्फ ४ दिनों में | यहाँ-वहाँ शिकायत करने पर कहीं जाकर मुझे मेरी कांसिग्न्मेंट मिली, जो कि ब्लू-डार्ट के ऑफिस में वितरण की राह देखते-देखते निराश की धुल से सनी थी |

अब मैंने कशम ले ली कि चाहे जो हो जाये अब कोई भी डाक सिर्फ और सिर्फ पोस्ट-ऑफिस के द्वारा ही भेजूंगा| क्यूंकि इन लंबे समय के साथ डाक विभाग भी बदल गया है, इसकी स्पीड-पोस्ट सेवा काम खर्च में ब्लू-डार्ट जैसी कंपनियों से भी कई गुना अच्छी सेवा उपलब्ध करा रही है |

………. तो अंत में बस इतना ही कहना चाहता हूँ –“लौट के बुद्धू घर को आये"

Saturday, July 12, 2014

कंप्यूटर विरोधी

 

वो कंप्यूटरीकरण के

सख्त विरोध में हैं

सिलिकॉन वैली में

दामाद की

खोज में हैं |

(ये कविता बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव पर व्यंग लेते हुए लिखी थी, जो कि हिन्दीनेस्ट.कॉम पर ०९ अगस्त, २००३ को प्रकाशित हुई थी |)

नई दिशा


पहले अच्छी तरह से

हड्डी-पसली तोड़ दो

खड़ा न हो सके

ऐसा निचोड़ दो

टूटकर पंगु हो जाए

तब देश को नया मोड़ दो ….

 

(०९ अगस्त, २००३ को हिन्दीनेस्ट.कॉम पर प्रकाशित )

Saturday, July 5, 2014

प्रकृति के साथ दो पल…

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संध्याकाल में अपने-अपने घरों को लौट कर आते पंछियों का झुंड… (छाया चित्र १)
संध्याकाल में अपने-अपने घरों को लौट कर आते पंछियों का झुंड… (छाया चित्र २)
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स्वछंदता में अकेलेपन की उदासी … (छाया चित्र १)
स्वछंदता में अकेलेपन की उदासी… (छाया चित्र २)
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खुला आसमां और स्वछंदता (छाया चित्र १ )
खुला आसमां और स्वछंदता (छाया चित्र २)
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Tuesday, November 12, 2013

साहित्य विनोद : एक नई ब्लॉग की शरुआत

http://sahityavinod.blogspot.in 


जल्द ही आपलोगों के सामने प्रस्तुत होने वाली है पिताश्री को समर्पित  एक नई ब्लॉग जिसमें अपने पिताश्री की रचनाओं की मोतियों की माला आपलोगों के सामने लानेवाला हूँ | कृपया कुछ इंतज़ार करें ...


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