अंशुमान चक्रपाणि का दशकों पुराना ब्लॉग नक्कारखाना (Nakkarkhana), विचारों के सैलाब को शब्द देने का एक माध्यम है.
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Wednesday, August 29, 2018
केश कर्तनालय गाथा
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Tuesday, July 17, 2018
हम कितने जिम्मेदार हैं???
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Thursday, July 12, 2018
"यायावर एक ट्रेवलर" फिर नई शुरुआत
इस भाग-दौर भरी जिन्दगी में अपनी यात्राओं (घुमक्कडी) के लिए जो भी थोड़ा समय निकाल पाता हूँ, उसके जुड़े अनुभवों को शब्दों में पिरोने की कोशिश कर रहा हूँ. इसका एकमात्र मकसद सिर्फ अपने लिए ट्रेवल डायरी और आपके लिए जानकारी को एक जगह लाने का प्रयास मात्र है. मैं कोई लेखक नहीं, पिताश्री के बाद ना ही कोई मार्गदर्शक बचा. जो भी टूटी-फूटी भाषा आती हैं, बस लिख रहा हूँ. ना मुझे हिन्दी का बहुत अच्छा ज्ञान हैं और ना व्याकरण का. गलतियाँ तो होंगीं. सुझाव देने का कष्ट करेंगे, तो शायद सुधार पाऊं. "यायावर एक ट्रेवलर" पर आप मेरी यात्रा संस्मरण को पढ़ सकते हैं.
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Friday, June 8, 2018
गावों का विकास
एक लंबे अर्से बाद ननिहाल जाना पड़ा बीमार मामू को देखने के लिये। पूर्णियां से लगभग 45 किलोमीटर दूर के गाँव में। यह लंबा अर्सा कुछ ज़्यादा ही लंबा है, लगभग 21 - 22 साल। नाना - नानी के स्वर्गवासी होने के बाद से कभी मेरा आना नहीं हुआ। 21 - 22 साल पहले यहां आने के लिये, बनमनखी से कोई सड़क नहीं थी, लोग 6-7 किलोमीटर नहर के किनारे पगडण्डी पर चलकर जाते थे या बैलगाड़ी थी वो भी चंद लोगों के पास। यही एक मात्र साधन था आने - जाने का। पर बिहार के विकास ने इस गाँव को भी नहीं छोड़ा और अब यहाँ भी बिजली, सड़क, दुकानें सब कुछ है, दुकाने पहले भी थी, पर सिर्फ छोटी - मोटी जरूरत का सामान और खाने पीने का सामान के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलता था, पर अब मोबाइल, सीमेंट, बालू, हार्डवेयर, सब्जी, मिठाई, जूस, चाय सब कुछ है। गाँव से सीधी बस सेवा पूर्णियां और कटिहार के लिये दिनभर और बनमनखी के लिये ऑटो भी चलती है। ये तो बस थोड़ा परिचय था ताकि मेरी बात समझने में आसानी हो।
अब आइये सीधी बात पर। मुझे 21 - 22 साल बाद आने के बाद जो बदलाव दिखाई दिया उससे आपको पहले ही अवगत करा दिया, बिजली, सड़क, दुकानें सब कुछ है, अब यहाँ। दो दिन बिताने के बाद जो सबसे बड़ा विकास मुझे दिखाई दिया, वो असल विकास न होकर गाँव का पतन था। अब आप कहेंगे की विकास तो दिख रहा है। हाँ जनाब, विकास तो दिख रहा है, पर लोगों का जीवन शैली वही है, पर दिखावा बढ़ गया। सरकार ने इंदिरा आवास योजना के तहत घर बनाने के लिये पैसे दिये, पर लाभान्वित और दलालों की नीयत साफ नहीं होने की वजह से दोनों ने मिल बाँट खाया, और जिंदगी वही 21 - 22 साल पहले वाले झोपड़ी में बीता रहें हैं, ये अलग बात है कि झोपड़ी में गैस चूल्हा, टीवी, मोटर बाइक सब है।
अब आइये गाँव के असली विकास पर नज़र डालें। सड़क और आनेजाने की सुविधाएं बढ़ गयी, जिसका असर ये हुआ कि शहर की बुराई ने यहाँ अपना पाँव फैलाया। बिहार में नीतीश जी ने शराबबन्दी कर रखी है, पर क्या कभी मुख्यमंत्री महोदय ने खुद पड़ताल करने की कोशिस की, शराबबन्दी असल में है भी या सिर्फ़ एक शिगूफा है शराबबन्दी? पूरा गाँव शराब (महुआ) के गिरफ्त में है। क्या गाँव के धनाढ्य, क्या निर्धन। जो भी मिला, दिन या दोपहर, शाम या रात भरपूर कोटे के साथ, नशे में धुत। गाँव में लोग इसकी वजह से अपना सेहद के साथ परिवार का सत्यानाश कर रहें है।
21 - 22 साल के बाद मेरे आगमन के वजह से जो मिला उसने पूछा क्या बदलाव नज़र आया। मुझे तो बस लोगों का पतन ही दिखाई दिया, विनाश ही चहुओर नज़र आया। जो भी रोजगार के अवसर बढ़ने से आमदनी बढ़ी, वो सब शराब की भट्टी, प्यासी और अतृप्त आत्मा की तरह पी रही है। यही है बिहार के असली विकास की कहानी और शराबबन्दी का असली सच।
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Thursday, June 8, 2017
लीची के आश्चर्यचकित फायदे
छोटी-सी लीची में कार्बोहाइड्रेट, विटामिन सी, विटामिन ए और बी कॉम्प्लेक्स, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, आयरन जैसे खनिज लवण पाए जाते हैं, जो इसे काफी फायदेमंद बना देते हैं।
इसमें 66 कैलोरी प्रति 100 ग्राम की मात्रा में उपलब्ध होती है।साथ ही इसमें सैच्युरेटेड फैट या संतृप्त वसा बिल्कुल भी नहीं होता।
प्रति 100 ग्राम लीची में विटामिन-सी की मात्रा 71.5 मिलीग्राम होती है, जो प्रतिदिन की आवश्यकता का 119 प्रतिशत है
लीची में मौजूद पोटेशियम ब्लड प्रेशर को नियंत्रित कर ह्दय-गति और खून की चाल को नियंत्रित करता है, जिससे हृदय रोग या अटैक की संभावना कम होती है।
बीटा कैरोटीन और ओलीगोनोल से भरपूर लीची दिल को स्वस्थ रखने में मददगार है.
लीची एक अच्छा ऐंटीऑक्सिडेंट भी है। इसमें मौजूद विटामिन सी हमारे शरीर में रक्त कोशिकाओं के निर्माण और लोहे के अवशोषण में भी मदद करता है, जो एक प्रतिरक्षा प्रणाली को बनाए रखने के लिए जरूरी है। जो आपकी त्वचा को स्वस्थ और खूबसूरत बनाए रखने में सहायक हैं।
ऑथ्राईटिस, दमा के मरीजों के लिए, सीने और पेट की जलन में, यदि कफ की शिकायत बनी रहती है, अगर आप वजन कम करना चाहते हैं तो लीची इसमें भी आपके लिए बेहद फायदेमंद फल है ।
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Monday, November 16, 2015
धर्म-निरपेक्ष
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Wednesday, September 3, 2014
कुरियर कंपनी ब्लू डर्ट का गोरख धंधा …
१९९० के दशक में भारतीय डाक विभाग के विसंगतियों और डाक वितरण में आयी खामियों या निकम्मेपन की वजह से देश में प्राइवेट कुरियर कंपनियां कुकुरमुत्ते की तरह पनपे और बढ़े | डाक से भेजी गये पत्र, पार्सल, मनी आर्डर आदि गंतव्य तक नहीं पहुँच पाना जैसे साधारण सी बात हो गई और इस बारे में कहीं किसी जगह कोई शिकायत सुननेवाला कोई नहीं था | पहले- पहल तो डाक-पाल से ही मान-मनोव्वल भरे लहजे में शिकायत किया जाता ताकी अगर उसके पास बिना वितरण के पड़ा होगा तो आज या कल तक तो वो इसे दे ही देगा और कई बार ऐसा होता भी था की आपने शिकायत की नहीं की आपकी डाक आ गई | मान-मनोव्वल भरे लहजे में शिकायत इस लिये किया जाता था क्यूंकि भविष्य में फिर तो उसी से पत्र, पत्रिका, पार्सल, मनी-आर्डर प्राप्त करना है | अगर गुस्सा गया तो पता चला की आने वाले हर डाक को फाड कर फेक दे तो हम क्या कर सकते थे | ऐसा इसलिए होता था क्यूंकि डाकपाल साधारणतया उसकी नज़र में फालतु सा लगने वाले डाक को पोस्ट ऑफिस में ही कूड़ेदान में डाल देता है या फिर ठण्ड के दिनों में आग जलाकर उस फालतु से (उसकी नज़र में ) डाक से ठण्ड से निजात पाने का जुगाड़ करने के लिये उसे पोस्ट ऑफिस के किसी कोने में फेकता जाता है | अगर इससे भी बात नहीं बनती तो हम ज्यादा-से-ज्यादा पोस्ट मास्टर से शिकायत करने पहुँच जाते और दो-चार बातें चिल्ला-चिल्ला कर सुनाकर अपने दिल की भड़ास निकाल लेते और बेचारे पोस्ट मास्टर साहब डाक पाल को बुला कर हिदायत देकर भेज देते लेकिन सुधरता तो कुछ भी नहीं था |
ये वजह थी देश में प्राइवेट कुरियर कम्पनियों के कुकुरमुत्ते की तरह पनपे और बढ़ेने की | और धीरे-धीरे हम लोग कुरियर कंपनियों पर पूरे निर्भर हो गये | चुकी लोगों की सोच बदलने लगी | अब सस्ती नहीं बल्की विश्सनीयता का माप-दंड चल पड़ा, जल्द से जल्द गंतव्य तक पहुचानें का महत्त्व हो गया | डाक विभाग न सिर्फ अपनी विश्सनीयता पूरी तरह से खो चुका था बल्कि और दिन-ब-दिन उसमे गिरावट होती गयी |
इन सब कारणों से कुरियर कंपनियों की चांदी होती गयी और लोग धीरे-धीरे पोस्ट-ऑफिस की डाक सेवा के बदले कुरियर कम्पनीयों पर निर्भर होते चले गये |
अब हालत ये है कि कुरियर कंपनियां हरेक पैकेट या हरेक पार्सल पर ग्राहकों से मोटी रकम तो वसूलती है, लेकिन वो गंतव्य तक पहुंचेगी इसकी कोई गारंटी नहीं | यानि जहां से चले थे एक लंबे रास्ते चल वापिस वहीँ पहुँच गये | हालत फिर वही डाक विभाग वाली हो गई | मेरी ब्लू-डार्ट जैसी नामी-गिनामी कुरियर कंपनी की सेवा का एक नहीं कई बार का अनुभव है | डाक जिसे कुरियर कंपनियां अंग्रजी में कांसिग्न्मेंट कहते हैं, दिल्ली से चली जिसके बदले डाक विभाग से तीन गुना राशी कंपनी ने वसूल की, लेकिन पुरे एक महीने बाद तक वो दिल्ली से भागलपुर नहीं पहुँच सकी | सबसे कमाल की बात तो ये कि कंपनी की वेब-साईट पर मेरे कांसिग्न्मेंट को वितरित या प्राप्त हुआ दिखा दिया गया और वो भी सिर्फ ४ दिनों में | यहाँ-वहाँ शिकायत करने पर कहीं जाकर मुझे मेरी कांसिग्न्मेंट मिली, जो कि ब्लू-डार्ट के ऑफिस में वितरण की राह देखते-देखते निराश की धुल से सनी थी |
अब मैंने कशम ले ली कि चाहे जो हो जाये अब कोई भी डाक सिर्फ और सिर्फ पोस्ट-ऑफिस के द्वारा ही भेजूंगा| क्यूंकि इन लंबे समय के साथ डाक विभाग भी बदल गया है, इसकी स्पीड-पोस्ट सेवा काम खर्च में ब्लू-डार्ट जैसी कंपनियों से भी कई गुना अच्छी सेवा उपलब्ध करा रही है |
………. तो अंत में बस इतना ही कहना चाहता हूँ –“लौट के बुद्धू घर को आये"
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Saturday, July 12, 2014
कंप्यूटर विरोधी
वो कंप्यूटरीकरण के
सख्त विरोध में हैं
सिलिकॉन वैली में
दामाद की
खोज में हैं |
(ये कविता बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव पर व्यंग लेते हुए लिखी थी, जो कि हिन्दीनेस्ट.कॉम पर ०९ अगस्त, २००३ को प्रकाशित हुई थी |)
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
नई दिशा
पहले अच्छी तरह से
हड्डी-पसली तोड़ दो
खड़ा न हो सके
ऐसा निचोड़ दो
टूटकर पंगु हो जाए
तब देश को नया मोड़ दो ….
(०९ अगस्त, २००३ को हिन्दीनेस्ट.कॉम पर प्रकाशित )
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Saturday, July 5, 2014
प्रकृति के साथ दो पल…
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
Tuesday, November 12, 2013
साहित्य विनोद : एक नई ब्लॉग की शरुआत
http://sahityavinod.blogspot.in
जल्द ही आपलोगों के सामने प्रस्तुत होने वाली है पिताश्री को समर्पित एक नई ब्लॉग जिसमें अपने पिताश्री की रचनाओं की मोतियों की माला आपलोगों के सामने लानेवाला हूँ | कृपया कुछ इंतज़ार करें ...
नक्कारखाना खुद को स्वछंद अभिव्यक्ति करने का माध्यम है. मुझे पूज्य पिताश्री से पढ़ने और लिखने का शौक विरासत में मिला, ये बात अलग है की मेरी लेखनी में उनके जैसा पैनापन और लोगों को बांधे रखने की कूबत नहीं.
नक्कारखाना एक छोटा-सा प्रयास है अपने अंतर्मन में उबलते विचारों को लिपिबद्ध करने का और दिल में जल रहे गुस्से के भड़ास को निकालने का. आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा जरूर बताये, आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इन्तजार रहेगा|
-धन्यवाद.
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