Thursday, August 15, 2019

चल घूम आएं


सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ,
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ !!

फोटो: नैनीताल के रास्ते में कहीं (Yayavar Ek Traveler.com से साभार)

कुछ लोग मेरे घूमने - फिरने से जुड़े पोस्ट से बड़े आहत होते हैं और कई मित्र तो इतने जल - भुन जाते हैं कि बस देखकर मुहँ बना आगे बढ़ जाते हैं बिना लाइक, बिना कॉमेंट. और लगे हाथ बुदबुदा जाते हैं पता नहीं कहाँ से पैसे लाता है? 🤔

पर कुछ होते हैं थोड़े हिम्मत वाले, दिलेर 😝 टाइप. तो वो देखते हैं और फिर उलझन में पड़ जाते हैं कि आखिर इतना कोई कैसे घुमक्कड़ी कर सकता है? 🤔 तो ऐसे लोग कभी - कभी पूछ बैठते हैं अमा यार स्पॉन्सर कहाँ से लाते हो? 😜😂

तो आज मैं वही बता देता हूँ, शुभ अवसर है 15 अगस्त और रक्षा बंधन का और मोदीजी ने अपने देश के नाम संबोधन में भी सबको टारगेट प्लान दे दिया है 15 जगहों को तीन साल में घूमने का तो ऐसे लोग और बिलबिला रहें हैं. 😝😂

देखो भाई, मैं एक छोटी - मोटी नौकरी करता हूँ और जो छुट्टियाँ लोग पेट दर्द और सर दर्द में लेते हैं दफ्तर से मैं उसी छुट्टी में छोटी - मोटी घुमक्कड़ी करता हूँ. बाकी होली हो या दीपावली कौनो लेना देना नहीं. मतबल समझे, इसे कहते हैं कुर्बानी. बच्चे के स्कूल जाना हो या डॉक्टर को दिखाना हो बच्चों को वो सब गृहमंत्री देखती है. मने मुझे ऐसी छुट्टियाँ लेनी नहीं पड़ती, जिसके लिए बाकी दफ्तर के लोग अर्जी लगाते हैं. 😜😂     और इसके लिए गृहमंत्री को तैयार किया है कठिन ट्रेनिंग देकर, शादी के बाद से ही - स्वतन्त्र बनो.

इब मामला है पेसे का, आखिर घूमने - फिरने को पेसे तो चाहिए गुरु? 🤔तो वो भी पता ही दूँ.

अपन है बिल्कुल हटके, मने जे मैं नहीं कह रिहा हूँ 😜😂
जे हमरी श्रीमतीजी बोले हैं अपने सखियों से. 🤣😝 
तो भाई बात जे है मैं किसी पार्टी - वाटी में जाता नहीं, तो महंगे कपड़े, परफ्यूम, स्प्रे जरूरत न पड़ती मुझे और गिफ्ट लेना-देना भी होता नहीं. दारू पीता नहीं और न पब देखी कभी और कोई और ऐयाशी की कोई तलब न होती. मतलब कपड़े जरूरत के हिसाब से और सस्ते ही लेता अब. हाँ, एक ज़माना था, जब सबसे मंहगे ब्राण्ड पहनता था. पर अब एक टी शर्ट ही कई साल घसीट लेता हूँ, गृहमंत्री कई टी शर्ट और जींस की सर्जरीकल स्ट्राइक कर चुकी है- बेरंग हो गए, फटने लगे करके पर अपने को कोई फर्क़ पड़ता नहीं.

तो ये जो आप ऐयाशीयों पर ख़र्चते हो न, वही मैं घूमने पर ख़र्चता हूँ. 😜😍और एक मामला है, मुझे रुपये पैसे का कोई मोह - माया है नहीं कि माल आया तो तहखाने में दबा दो. 😝😂 अबे रुपये - पैसे खर्च करने के लिए होते हैं. गधे की तरह कमा क्यों रहे हो जब उसे खुद भी भोग ही न पा रहे?

तो इतना लिखने का मतबल जे है कि थोड़ा सोचो, विचारों, काहे कुंए के मेढक बने हो? और यही वजह है डिप्रेशन में जाते हो, अपनी समस्याओं को लेकर बैठ रोते रहते हो दिन-रात. नींद नहीं आती तो नींद की गोली ले रहे, ब्लड प्रेसर बढ़ रहा आदि-आदि. और डॉक्टर साहब को जाकर तहखाने से निकाल - निकाल माल पहुंचाते हो कि वो ठीक कर देगा. कुछछू नै कर पाएगा आपका डाक्टरवा, बस माल समेटता रहेगा जब तक जिन्दा रहोगे. क्योंकि इलाज पत्ते का कर रहे हैं और बीमार है जड़ मन. उसे घुमाओ - फिराओ, मौज - मस्ती करने दो, मन मयूरा को नाचने दो. अब नाचने दो मतलब शादियों में होने वाला नागिन डान्स मत समझ लेना. 😜😂
कुछ समझ आया हो तो बताना, बड़बड़ाते आगे मत निकल जाना, बिना लाइक और कॉमेंट किए. और जिन्हें और मिर्ची लगी हो, जाओ दारू पियो और मरो. अब अगले जन्म में ही आदमी बनने की कोशिश करना.
😝😜😂

Tuesday, July 30, 2019

घुमक्कडी क्यों जरूरी है





घुमक्कडी क्यों ???


घुमक्कडी अपनी कुंठा शांत करने के लिए नहीं होती,
घुमक्कडी होती है जीने के लिए और मुर्दे इसका स्वाद नहीं जान सकते.
घूमना मतलब खुद को जानना-पहचानना, घूमना मतलब देश के संस्कृति को, अपनी धरोहर को जानना. जब आप बाहर निकलते हैं तो हर एक दिन संघर्ष होता है हर दिन वो आपको जिंदिगी में जीने और परेशानियों से लड़ने कि शक्ति देती हैं. मेरा तो मत हैं- 
“Travel, initially, to lose myself; and travel, next to find myself.”
मुझ से जब कोई पूछता है-
भाई बहुत घूमते हो, अभी कुछ दिनों पहले ही तो घूम कर लौटे न ?
क्या करने जाते हो यार ?
मेरा जवाब होता है -
"पिछली बार प्यास जगाने गया था और अब बुझाने जा रहा हूँ"
😍😛😍
और हाँ, घूमने के लिए ढेर सारे पैसे चाहिए, ऐसा नहीं हैं ?
पर्यटक और घुमक्कडी/ यायावर अलग-अलग होते हैं और घुमक्कड/ यायावर का अपना ही तरीका होता है. पर्यटक से अलग.
मैं खुद छोटी सी नौकरी कर रहा हूँ, किराये के मकान में रहता हूँ.
तो क्या जीना छोड दूँ?
कबाड़ी की तरह सिर्फ कमाने, खाने और बच्चे पैदा करना, पैसे बैंक में छोडकर मर जाना मेरी फितरत नहीं.
यायावरी परमो धर्मः
अंशुमान चक्रपाणि

Sunday, July 14, 2019

सुबह उठकर पानी क्यों पीना चाहिए?

सुबह उठकर पानी क्यों पीना चाहिए?





  • सुबह पानी पीने से, शरीर में मौजूद विषैले पदार्थ निकल जाते हैं, जिससे त्वचा में चमक आती है.
  • सुबह पानी पीने से, नई कोशिकाओं का निर्माण तेजी से होता है.
  • सुबह पानी पीने से, मेटाबॉलिज्म तेज हो जाता है, जिससे मोटापे को कम करने में मदद करता है.
  • सुबह पानी पीने से, पेट साफ रहता है और कब्ज की शिकायत नहीं होती. आजकल इस समस्या से हर दूसरा व्यक्ति जूझ रहा है. पेट साफ रहने से भूख भी खुलकर लगती है.
  • सुबह पानी पीने से, रेड ब्लड सेल तेजी से बनते हैं और इससे आप सेहदमंद रहते हैं. अगर आपको खून की कमी  है तो आज से ही सुबह उठकर पानी पीने की आदत डालें.

Thursday, July 4, 2019

वित्त संस्थानों के पास पड़े हैं लावारिस करोड़ों

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के दो दिनों पहले लोक सभा में दिए जानकारी के अनुसार सिर्फ बैंकों के पास, ऐसी राशि जिसका कोई लेनदार नहीं, 2018 के अंत में 26.8% की वृद्धि के साथ 14,578 करोड़ रुपये हो गई है.


आखिर ऐसा होता क्यों है? आपके करोड़ों रूपये बैंकों, बीमा कंपनियों, पीएफ अकाउंट, डिविडेंट, शेयर और म्यूचुअल फंड में पड़े क्यों रह जाते हैं?

Unclaimed amounts with banks in India.

इसका सबसे बड़ा कारण देश में फाइनैंशियल लिटरेसी की कमी हैं.
आइए इसका कारण और इससे बचने के उपाय जाने, जिसके बारे में आपको कोई नहीं बताएगा:
1. पहला सबसे बड़ा कारण, हिंदुस्तान में फाइनैंश और सेक्स ऐसे विषय हैं जिसपर कोई बात करना नहीं चाहता, और अधूरी जानकारी सिर्फ आपका पैसा ही नहीं, आपके अपनों की जिंदगी भी तबाह करती है.

2. बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट और रेकरिंग डिपॉजिट, शेयर और म्यूचुअल फंड में ज्यादातर निवेश एकल या सिंगल किया जाता है और इतना छुप - छुपाकर की परिवार के सदस्यों को भी खबर न हो. ऐसी स्थिति में जमाकर्ता के निधन के बाद यह रकम यूँ ही लावारिस अवस्था में सरकार के पास पड़ी रहती है. कभी भी बैंकों के फिक्स्ड डिपॉजिट और रेकरिंग डिपॉजिट, शेयर और म्यूचुअल फंड में निवेश सिंगल मोड में न करें, इसमें परिवार के किसी न किसी सदस्य को जॉइंट् में शामिल करें. लोग दलील देते हैं, नॉमिनी में तो नाम है ही. पर महानुभाव आपके गुजर जाने के बाद नॉमिनी को कैसे पता चलेगा कि यहाँ माल जमा किया है?

3. जॉब बदलना और लगातार बदलते रहना आजकल आम बात है, पर इसके साथ ही पीएफ में जमा राशि पर कभी ध्यान नहीं दिया जाता. इसका सबसे बेहतर उपाय है जॉब बदलें तो पहले पीएफ अकाउंट को ट्रांसफर करवाएं या फिर कुछ समय बाद पुराने पीएफ अकाउंट से पैसे निकाल लें, अगर आपने वही अकाउंट ट्रान्सफर नहीं करवाया.

4. बैंकों में जमा राशि और करवाई गई जीवन बीमा की जानकारी परिवार के सदस्यों को भी दें. और इसके संबंधित सभी कागजात और खातों को एक जगह रखें. जिससे आपके न रहने की स्थिति में भी परिवार को आसानी से मिल सके.

उम्मीद है इसे पढ़कर अमल करेंगे और इसे शेयर कर औरों तक पहुंचाएंगे.

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Sunday, June 16, 2019

जंगल के दावानल की चौकाने वाला सच

बार-बार जंगलों की भीषण आग देखकर बचपन से सोचता था, आखिर ये लगती कैसे है? और हमें बताया समझाया जाता था - 
"गर्मी ज्यादा होने से पेड़ - पेड़ से टकराते हैं और आग लग जाती है."

कितनी चुतियापे वाली बात है कि उत्तराखंड, हिमाचल के जंगलों का तापमान बामुश्किल 30-32 डिग्री जाता है और घने जंगलों और ठण्डी जगहों का तो 15-20 डिग्री ही तापमान होता है तो फिर गर्मी कहाँ हैं पेड़ में आग लगाने वाली. आज Ajit Singh के वॉल पर पहाडों की आग का बड़ा ही बीभत्स रूप के दर्शन हुए. पहली बार जाना कि ये सब प्रायोजित आग है और पहाड़ी लोकल गाँव के लोग ही इसे लगाते हैं. 🤔😢
ऐसे लोगों को तो उसी आग में भुनकर 😠👹 के चील - कौओं को महाभोज देना चाहिए. पढ़िए आप भी असली तथ्य, ये वही लोग है जो मैदानी क्षेत्र के लोगों को पहाड़ी क्षेत्र में आकर उसका नाश करने के लिए कोसते हैं 🙁😔, पर अपने कुकर्मों पर मोतियाबिंद हो जाता है आंखों पर.😎
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Ajit Singh जी के वॉल से पोस्ट :
इस समय हिमांचल के बनी गांव में हूँ । यहां मेरे दोनो बेटे एक Wrestling Academy में रहते हैं और पहलवानी करते हैं । 
कल रात ये पहाड़ियाँ धू धू कर जल रही थीं ।
पहाड़ों में आग लगती नही , लोकल लोग जानबूझ के लगाते हैं । june के महीने में ये इनका हर साल का काम होता है ।

इनका तर्क है कि इस तरह पुराना सूखा घास फूस सब जल जाता है और फिर बरसात के बाद जो नई घास उगती है वो इनके पशुओं के लिए बेहतर होती है ।
इस आग में बड़े पेड़ों को तो हल्का फुल्का नुकसान ही होता है परंतु पिछली बरसात में जो नए पेड़ उगे थे वो बेचारे भस्म हो जाते हैं ।
इसके अलावा जीव जंतु बेचारे .....…. हज़ारों पक्षी इन वनों में रहते हैं ........ उनका क्या ???????

मनुष्य इतना लालची हो चुका है कि इस पूरी धरती पे कब्जा करके भी उसका पेट नही भरा ........ बेचारा , ये दिल मांगे More .......
चारों तरफ गर्मी से त्राहि त्राहि मची है ........ इस बार तो यहां हिमांचल में भी रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ रही है । इसके बावजूद मनुष्य सबक सीखने को तैयार नही .........
उसको More चाहिए.........

असल मे हमारी सरकार हिजड़ी है .......... इस किसान नामक पावरफुल lobby के सामने तुरंत घुटने टेक देती है ........ और ये हमारे पर्यावरण का अंधा धुंध दोहन / विनाश कर रहे हैं । अगर हम जल्दी ही न चेते तो विनाश अवश्यम्भावी है .......... ऐसी तमाम practices जिनसे पर्यावरण का विनाश होता है उनपे तुरंत सख्ती से रोक लगाई जानी चाहिए ।
सरकार के पास power है कि वो पूरे गांव पे सामूहिक जुर्माना लगा सकती है । सरकार को चाहिए कि वो सबसे पहले तो इलाके के सभी ग्राम ओरधान और Revenue officials यानी पटवारी , कानूनगो , नायब तहसीलदार , तहसीलदार ,SDM को suspend करे ...... और फिर सार्वजनिक चेतावनी दे दे कि फिर कभी दोबारा जंगल को आग लगाई तो पूरे गांव या फिर पूरी तहसील को सामूहिक जुर्माना होगा ..........
दो चार को जेल में सड़ाओ तभी सुधरेंगे ..........

Tuesday, December 11, 2018

चिलचिलाती ठण्ड और रेलवे की कुल्फी

लगभग एक घंटे की यात्रा परिवार और बच्चों के साथ स्लीपर कोच में कर रहा हूँ. भारतीय रेलवे के स्लीपर कोच की सबसे बड़ी समस्या जाड़े में और बरसात में जो मुझे लगती है वो है ट्रेन की खिड़कियों का ठीक से न बंद होना और न खुलना. बच्चे खिड़की पर हाथ रख बाहर का नजारा लेना चाहते हैं, पर डर लगा रहता कब शटर गिर पड़े. कई बार गिरते शटर से लोगों को घायल होते भी खुब देखा है.

आज की हमारी समस्या यह है कि शटर बंद नहीं हो रहे, ट्रेन के हिलने - डूलने के कारण पाँच मिनट में ही खिड़की खुद व खुद खुल जाते हैं. मतलब ऑटोमैटिक वातानुकूलन कर रहे दे रहें हैं कोच का. अब अन्दर बैठे लोग जो पहले से दुबके बैठे हैं, अपने हाथ को दोनों पैरों के बीच दबाए ठंड से बचने को वो ऑटोमैटिक वातानुकूलित हो रहे हैं. मेरी परेशानी तो एक घंटे की है. पर इस चिलचिलाती ठंड में जो भी यात्री नीचे के सीट पर पूरी रात यात्रा करेंगे, उनका कुल्फी जमना तय है. मतलब स्लीपर कोच में यात्रा करने के लिए कम्बल नहीं रजाई लेकर जाना पड़ेगा या फिर एक बढ़िया स्लीपिंग बैग. जिसमें घुस दुबका जा सके और कुल्फी होने से बचे.

वैसे हमारे यहाँ फिर भी थोड़ी राहत रहती है, क्योंकि ट्रेन में हमेशा ही सीट से ज्यादा यात्री होते हैं, जो कोच को ऑटोमैटिक वातानुकूलित होने से गर्मी देकर बचाए रखने में सहायक होते हैं.

बस यूँ ही

Wednesday, November 28, 2018

जाड़े की ठण्ड और तन नंगा

एक मार्मिक अपील 


गंगा जी के दर्शन किसी न किसी बहाने हो रहा है, कृपा बनी रहे गंगा माँ.

बच्चों की पिछले सर्दी की कई गरम कपड़े छोटे हो गए जो हमारे काम के नहीं थे. एक थैले में डाल लेकर चले गंगा के तट पर, वापस आते हुए ठंड में एक छोटा बच्चा बिना कपड़े के नजर आया अपनी माँ के साथ सड़क पर बैठा, घर के बाहर. बेटे को बोला पूरा थैला ही दे दो. उसने बड़े प्यार से बोला - "अंटी हमारा कपड़ा है, छोटा हो गया बाबू के लिए रख लीजिए"

बेचारी गरीब माँ सिर्फ मुंह देखती रह गई और हम चल दिए.

दिल रोता है ऐसी गरीबी देखकर.
ऐसे कपडे हम सबके घरों में पड़े होते हैं, जिनका हम इस्तेमाल नहीं करते या जो बच्चों को छोटे हो जाते हैं. सोचिए जरा, अगर यही कपडे साफ कर हम किसी जरूरतमंद को दे दें तो हम किसी गरीब की जान और मान बचाने में मदद करेंगे. पर हम करते क्या हैं, ऐसे कपडे हमारे - आपके घरों में पोछा बन जाता है या ऐसे ही कूडेदान में डाल देते हैं |
आइये सब मिलकर सोचे, उनके लिए जो लाचार हैं.




ऐसे कपड़ों को एक निश्चित जगह रखा जा सकता है, जहाँ से जरूरतमंद लोग इसे ले जा सकें. 

Friday, November 9, 2018

मनुष्य का पशु रूप

"भर्तृहरि नीति शतक" से सादर समर्पित :
साहित्यसङ्गीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः ।
तृणं न खादन्नपि जीवमानस्तद्भागधेयं परमं पशूनाम् ॥

हिन्दी में अनुवाद :
साहित्य, संगीत और कला से विहीन मनुष्य साक्षात पूंछ और सींघ रहित पशु के समान है। और ये पशुओं की खुद्किस्मती है की वो उनकी तरह घास नहीं खाता।

Meaning in English :
A person destitute of literature, music or the arts is as good as an animal without a trail or horns. It is the good fortunes of the animals that he doesn't eat grass like them.

Wednesday, November 7, 2018

दीपावली और प्रदूषण - एक साजिश

दीपावली और प्रदूषण - एक साजिश  


किसने इन गधों को वैज्ञानिक और अनुसंधान करने की योग्यता की डिग्रीयां दी? जैसे मनमोहन सिंह अर्थशास्त्री कहलाने के लायक नहीं थे, उसी श्रेणी के ये गधे वैज्ञानिक और खानग्रेसी पर्यावरणविद  दीपावली से प्रदूषण होता है का हंगामा खड़ा किये हैं पिछले कुछ सालों से। क्रिसमस और नव वर्ष के उपलक्ष में भी उच्च वर्गो द्वारा जमकर आतिसबाजी की जाती है, लेकिन वो आतिसबाजी में प्रयुक्त पटाखे बिलकुल प्राकृतिक और हवन सामग्रियों से बनाया जाता है, जिससे वातावरण शुद्धि होती है।

गधे वैज्ञानिक, मुल्ले मीलॉर्ड और खानग्रेसी पर्यावरणविदों अब बताओ ये दीपावली के दो दिन पहले वायु प्रदूषण 20 गुणा कैसे बढ़ गई दिल्ली में ??? क्या तेरे बाप - नाना - दादा स्वर्ग में आतिसबाजी कर रहें हैं जिसका प्रदूषण दिल्ली तक पहुंच गई???

इन गधों को यही समझ नहीं आता यह समय गर्मी और सर्दियों के बीच का है, जिसमें वायु घनीभूत हो रही है, गंदी हवा को नीचे से ऊपर जाने से रोक रही है। जिसके कारण कोहरे जैसा दिख रहा है और वायु प्रदूषित हो रहा है। यह कोई नई बात नहीं है, हर वर्ष ये सिलसिला चलता आया है और 100% पटाखे चलाने पर प्रतिबंध लगा देने के बाद भी ऐसे ही चलता रहेगा।

हिन्दुओं को भेड़ - बकरी समझने वाले लोग जब तक अपने कुंद मानसिकता और धर्म की राजनीति से बाहर आकर नहीं सोचेंगे तब तक ऐसे ही जोकरों की तरह मसखरी करेंगें टेलीविजन पर बैठ कर कर प्रदूषण पटाखों से बढ़ता है और अपने को बड़ा समझदार समझने वाले लोग चाय दुकान फेसबुक और ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया पर बैठ ज्ञान पेलेंगे।

Tuesday, November 6, 2018

दीपावली के बहाने - "हम किस गली जा रहे हैं"

दीये और बाती


दीपावली पर कब दीपक की जगह मोमबत्ती ने ले लिया हमें पता ही नहीं चला। पर पिछले कई सालों से हमने यह गलती सुधारी और वापस देशी बन गया और हम पारंपरिक दीये की दीपावली मनाने लगे, क्योंकि यह त्योहार कोई कैंडलावली तो है नहीं जो हम कैंडल जलाए और न ही अभी मैंने अपना धर्म बदल कर क्रिस्चन होने के बारे कुछ सोचा है।

दीपावली के दीये, पूजन सामग्री आदि - आदि की खरीद माताश्री ने की तो माताश्री बाजार में कैसे क्या हुआ बता रही थी और समाचार पत्र देख रहीं थी। मैं वही बैठा था तो मेरी नजर समाचार पत्र पर एक जगह जाकर अटक गई। प्रसंग वही था जो हमारे और माताश्री के बीच वार्तालाप का विषय था - दीये बेचने वाले गरीब की दीपावली में स्थिति । समाचार और माताश्री के बात का निचोड़ -

पिछले चार दिनों से मिट्टी के दीपक बेचने वाले गरीब की दीपावली के दो दिन पहले हालत ये  थी कि बेचारे ने 100 रुपये में 100 दीये के मूल्य पर 400 रुपये की भी बिक्री नहीं की। जबकि वही बगल में मोमबत्ती बेचने वाले सेठजी के पास भीड़ उमड़ी पड़ी थी। उस दीये वाले गरीब के छोटे - छोटे बच्चे नए कपड़े की जिद कर रहे हैं इस दीपावली, जो कि मुश्किल से सभ्‍य लोगों के टेबल की शोभा छोटे पिज्जा के मूल्य पर ही हो जाएंगे, पर हाय रे तेरी किस्मत!

पत्रकार महोदय को गरीब दीयेवाले की बताते बताते आँखे छलछला आई -

 "बच्चबन के एकगो नया कपड़ों और दुई गो लड्डू न दिलाभे पारिबे अबकी लागै छै ।"

यह है हमारे दीपावली मनाने का तरीका। सेठ और माल से मोमबत्ती खरीद लेंगे, 1000 से 2000 रुपये किलो की मिठाई, चाइना के झालर 2000 - 4000 रुपये के घर के बाहर टाँग देंगे, वो भी बिंदास सीना ठोकर की हम तो चाइनीज ही लगाएंगे। पटाखे को कोई कैसे भूल सकता है, इसके बिना तो लगेगा ही नहीं कि हम हिन्दु हैं तो हिन्दू सिद्ध करने के लिये मात्र 5000 रुपल्ली क्या चीज है भई  

पर वो गरीब जो महीनों से अपने बच्चो को नए कपड़े और मात्र दो अदद लड्डू देने का वादा भी पूरा न हो पाने के सदमे में दिल से रो रहा है, याद रखो उसकी हाय भी दीपावली के मंगलमय वातावरण में हमारे ही आसपास मंडराने वाली है और दीपावली में आपके घर लक्ष्मीजी आये या न आये, पर ये गरीब की हाय तो कही दूसरे ग्रह नहीं पर नहीं जाने वाली।

वैसे हमने या आपने क्या इनका ठेका ले रखा है, अपनी-अपनी किस्मत है। मरने दो इनको इनके हाल पर।

Let's Start Our Party. Wish You a Very Happy & Prosperous Deepawali. 

गरीब तेरी यही कहानी,
दिल में दर्द और आंखों में पानी।

Wednesday, August 29, 2018

केश कर्तनालय गाथा

आज दफ्तर का साप्ताहिक अवकाश का दिन है, ये इसलिये बता रहा हूँ कि इस प्राणी का रविवार नहीं होता | अभी बिस्तर पर निद्रा देवी की आगोस से अलसाया उठा ही था और मदहोशी छाई हुई ही थी कि सुबह-सुबह बेटे ने गुसलखाने में घुसने के पहले ही तुगलकी फरमान सुना दिया –
आज पापा मुझे स्कूल बस में छोड़ने जायेंगे, नहीं तो मैं स्कूल नहीं जाऊंगा|

छुट्टी का दिन मतलब एक दिन की बेरोजगारी | श्रीमतीजी ने भी मुस्कराते हुए कहा छोड़ आइये ना आप ही | बेचारा शादी-शुदा निरीह-सा आदमी नामक प्राणी कर भी कर सकता है इस परिस्थिति में | मैं भी घुस गया जल्दी से दूसरे गुसलखाने में, आखिर बस स्टैंड पर छोड़ने जाने के पहले नित्य-क्रिया से निवृत होने के साथ थोबड़े को थोड़ा दुरुस्त तो करना ही था | बेटे के तैयार होते-होते मैं भी तैयार होकर अपनी फटफटिया निकाली और नखरिले नटखट को बस स्टैंड छोड़ आया |

घर वापसी के पहले अपने हवाओं में लहराते टेढ़े-मेढे जुल्फों को थोड़ा रास्ते पर लाने के लिए केश कर्तनालय का रुख किया | अपने पसंदीदी केश कर्तनालय में घुसने के पहले बता दूँ, ये है तो छोटा सा केश कर्तनालय पर नये-नवेले लौंडों की भीड़ मधुमक्खी के छत्तें की तरह लगी रहती है | कारण... कारण ये है कि राजा जो इस केश कर्तनालय के संचालक हैं के साथ में जादू है | आपको चाहे किसी भी फ़िल्मी हस्ती के घोसले को अपने खोपड़ी पर बनवानी हो या खोपड़ी को आजकल की नई चलन के हिसाब से आधी सफाचट, आधी घोसले में तब्दील करवानी हो, सब करता है ये राजा भाई और वो भी बिना जेब काटे | मैं इतना क्यों बता रहा हूँ इस केश कर्तनालय के बारे में, कहीं ये कोई प्रोमोशनल या स्पोंसर्ड पोस्ट तो नहीं???

अरे नहीं भाई, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं, असल में यही तो मेरे दुःख का कारण हैं | मैं अपनी जुल्फों की कटाई- छंटाई तब तक टालता रहता हूँ, जब तक मेरी शक्ल भालु जैसी नहीं हो जाती | इसका कारण है केश कर्तनालय में जमी मधुमक्खी के छत्तें सी भीड़, जिसके कारण अपनी पारी के इंतजार में दो-दो घंटे बिताने पड़ते हैं | और आज तो छोटे नवाब की भी जुल्फों को सवारना था, जो भालू जैसी हुई नहीं थी पर अगले साप्ताहिक अवकाश तक हो ही जाने वाली थी | मतलब आज ढाई-तीन घंटे का सत्यानाश वो भी उस साप्ताहिक अवकाश वाले दिन जो पन्द्रह दिनों  बाद मिल रही हो | खैर किया क्या जाये, कहीं और जाने से संतुष्टि भी नहीं मिलती | लेकिन जैसे ही अपनी फटफटिया बाहर खड़ी कर अन्दर गया तो पता चला कि आज भीड़ नहीं है और एक, जिनकी लहलहाती हरी-भरी जुल्फों की बगिया को बेरहमी से रेगिस्तान बनाया जा रहा था के बाद मेरे ही खोपड़ी पर कैची और उस्तुरा वाला हाथ फिरने वाला था | खैर, लगभग पन्द्रह मिनट में अपनी बारी आ गई और अपनी जुल्फों की कटाई-छंटाई, खाद-पानी का काम इतनी जल्दी निपट जाने से मन ही मन खुश भी था |

अब आप कहेंगे बेकार ही इतना चिल-पो कर रहा हूँ और एक फालतु पोस्ट भी लिख डाला | रुकिए ... रुकिए मेरा दुःख अभी समाप्त नहीं हुआ | छोटे नवाब को छुट्टी के बाद लेकर जब दोपहर में वापस उसी केश कर्तनालय पहुँचा तो पता चला कि पांच-छः लौंडे जमें हैं पहले से | मतलब कम-से-कम ढाई-तीन घंटे तो लगने ही थे | फिर सोचा नहीं इतना समय नहीं दे सकता तो चल पड़ा दूसरे केश कर्तनालय की ओर जो पास में ही था | वहाँ भी चार लोग जमें थे तो फिर तीसरी केश कर्तनालय में चला गया | हाँ, यहाँ भीड़ नहीं थी, सुबह जैसे मुझे संयोग से ऐसा मिल गया था मेरे पसंदीदा केश कर्तनालय में सिर्फ एक | कुछ ही देर में छोटे नवाब ठाठ से बैठ अपना केश बनवा रहे थे और मैं बैठा सोच रहा था क्या हम पुरुष अपनी केश की थोड़ी-मोडी कटाई-छंटाई खुद से घर पर नहीं कर सकते क्या ??? कुछ तो जुगत लगानी पड़ेगी, अब इतने समय की बर्बादी मैं केश कर्तनालय में फालतु बैठकर तो नहीं कर सकता | 

जो रास्ते मुझे सूझ रहें हैं वो ये हैं :

१. पहला बात जो मेरे कुराफाती खोपड़ी में आ रही थी वो थी अपनी केश-सज्जा या कटाई-छंटाई खुद करना | अब वो बाद में कैसा दिखता हैं, ये देखने वाली बात होगी | लेकिन ये होगा कैसे ??? देखता हूँ, शायद कोई मिल जाये जुगत बताने वाला |


२. अपनी लहलहाती हरी-भरी जुल्फों की बगिया को, भले ही थोडा 
रेगिस्तानी इलाका भी है, बेरहमी से रेगिस्तान बना डालूं और उसे जैसे दाढ़ी बनाता हूँ वैसे ही क्रीम पोतकर चिकनाता रहूँ | केश कर्तनालय का जिन्दगी भर का झंझट ही खत्म |

३. जैसा चल रहा है वैसा चलने दूँ, बस कोई टुटपुंजिया-सा केश कर्तनालय की खोज कर लूँ ताकि अधिक समय बर्बाद ना करना पड़े | अब वो चाहे कैसा भी शक्ल बना दे, समय तो बचेगा |

यही थी मेरी बड़ी परेशानी, मेरी समस्या |

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